"रिमझिम गिरे सावन"
By Dr. Varsha Khire
मैं हार गई पिय तुम पर हिय अपना
नयन हो गए चंचल चितवन
बेचैन कर गयी मुस्कान अधर को
मन की तड़प कहूँ कैसे पिय तुमसे।
हे कृष्णसार मृग से स्याह मेघ
पहुंचा दो यह संदेसा पिय तक
प्रियतम की आस में तमिस्र बन गया हृदय आज
रिमझिम बिंदु झड़ी बरसा रही प्रेम का रस
मिलन हो रहा प्रेम विरहणी का
वरन मैं कृशानु तरंगिणी सी
तट पर बैठी अपने अर्णव से मिलने को आतुर।
हे अम्बुद कह दो जाकर पिय से
पुकार रही मैं तुमको होकर आकुल
सिक्त कर दो मेरा यह निर्जल सावन
पूर्ण कर जाओ मेरा यह मधुर स्वप्न
गझिन रुक्ष के नीचे पसरे प्रेम का आलिंगन
भीगे तरुण काया
भीगे प्रेमी मन
खिल जाये सावन का पुहुप....।
By Dr. Varsha Khire

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