राम की विडम्बना
By Inder Raheja
करवट बदल बदल परेशान ,
मन में हो कोई ,कहा लगे ध्यान ,
बेमौसम जगी सुध वसंत की,
एक कली ना छाना बागान ।
बिन प्रायश्चित अक्षम विश्राम ,
चैना निद्रा सब उसके गुलाम ,
चंदा को ताके भेजे पैगाम ,
हूँ मैं कोमल कठोर था काम ।
गूंजे आवाज़े सभा की,दाबे पुरुषोत्तम कान रे,
बहकी हवा तभी दौड़े चन्दर राम रे।
मर्यादा धनुष पे, बाण उठा जब ऋजु था चाढ़त ।
तरफा सुपुर्द किया अधिकार,विलोमत जगाई कैसी आढ़त ।
मैथली मैली धोबी ज्यादा जानत ।
आंजनेय जाग बयान कर मेरी हालत ।
व्याकुल चिंतन वियोग मिलावट ।
अश्र सघन मनोरत की गिरावट ।
सिसके अलाप उखड़ी सांस सांस हरि बसावट ।
वाटिका मोहती बनावट,
छीने ना राग विराग रे
बहकी हवा तभी दौड़े चंद्र राम रे।
जनक अयोध्या के बीच का अनुभव ।
अरण्य जीवन, इंतज़ार विभूषण ।
चीर श्वेत ,श्रृंगार की तड़पन ।
धर्म मद के बीच का दर्पण ।
लंका नरेश मनावे सुबह शामा ।
तरु तले गले सुंदर अभिलाषा ।
त्यागे वचन जो लिया पुराना ।
वैभव गौरव चूमे चरण अंगुष्ट तुम्हारा ।
गर दीजो हमे वही अभिमान रे ।
बहकी हवा तभी दौड़े चन्दर राम रे ।
परस्पर, सदृश इंदु पे विनिमय चला ।
व्यथा बनी हिम्मत, नभ पे चाँद ढला और भानु चढ़ा ।
धैर्य भी उत्सुकता से पला ।
कचोधन कहलाती त्रुटि ,जब निष्ठा का था वितान डला ।
दृढ़ अग्नि में न्यास गला ।
तत्क्षण साध के शमन में डला ।
राम सुमिरन से तिष्ण किया, मास खपा ।
उसके अहंकार में खंजर सा घपा ।
आहत रावण को मारा ,तो तो! अविरत हुआ राम नाम रे ।
बहकी हवा तभी दौड़े चन्दर राम रे ।
अग्नि पे चलके भी ना छूटे दाग काला ।
कोक में बीज तपा पड़ा पाओ में छाला ।
क्या अहल्या क्या शबरी-तारा ।
सब शासननीति का चारा ।
प्यार तो होता पुनर्विचार ।
पहले हक़ बनता था मृदुल कुमार ।
तुम अंत करो तो कुछ मैं बोल दूं ।
शिव धनुष तो पुनर तोड़ दूं ।
किन्तु, भूल भुलैया जैसे भाव-व्रत में मुमुक्षु के मार्ग रे।
बहकी हवा तभी दौड़े चन्दर राम रे ।
कुलधर्म की ग्रीवा से ग्रीवा बंधी ,
कुलधर्म से बंधी कमर ।
सिंहासन के पाए तले रुचि मन की,
प्रजातंत्र की उंगलियो में दबे अधर ।
वाक्य फिर जग में विख्यात हुआ,
अचिन्त्य मेरा एक अतर ।
विश्वामित्र का चरम अभ्यास ,
मिश्रित जीवन दारुण डगर ।
मैं कैद पड़ा हूँ वर्ग-सोच में, मेरे भिन्न भिन्न अर्थात रे।
बहकी हवा तभी दौड़े चन्दर राम रे ।
पंडित था वो तुम सावित्री की छाया।
जगत को मैने अत्यंत समझाया ।
तिमिर दृष्टि कल्पी मृग की काया ।
ना लक्ष्मण ना तुम थी जब वापस आया ।
सेना जोड़ी निपुण तट भी टपाया ।
बाणों का भी भावो का भी विध्वंस मचाया ।
भीतर क्या था किसे जताया ।
शस्य अम्बु फीका खपाया ।
शीत ग्रीष्म वर्षा अभ्यंतर संताप रे।
बहकी हवा तभी दौड़े चन्दर राम रे ।
भीतर की आग जब हर पल उबाले
रीतिरिवाज धर पादुका चढ़ा ले
राज पाठ तो कोइओ चला ले
सीता हँसे जहाँ नया लोक बसा ले
जुटा के हिम्मत धोतर संभाला रे ।
मिली जानकी उर रंगा रंग नाचा रे ।
बेकार जीते जगत जो हारे प्रेम धाम रे ।
बहकी हवा तभी दौड़े चन्दर राम रे ।
By Inder Raheja

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