राबता
By Dr Meenakshi Saini
आज मेरे टहलते कदम
ले गए मुझे समुद्र किनारे
शायद बताना चाहते थे
वो सब छुपे राज
पीछे थे जो उस हसीन नजारे
खिलखिला जाता था
हमेशा ये मन मेरा
देख तूफानी लहरों को
किनारे तक आते,
उससे टकराते,
और वापिस जाते हुए।
देखती थी मैं अक्सर
उस किनारे को गीला होते,
धूप की तेज़ तपिश में सूखते,
और फिर से उसी लहर के,
आने से दोबारा भीगते हुए।
हर बार ये लहरें छोड़ जाती थीं
बहुत सी निशानियां
जिसे रखता था संभाल वो किनारा
एक याद की तरह
बहुत सुकुनियत से भरे लगते थे
वो नजारे और वो मंजर
पर उनकी गहराइयों को
शायद कोई नहीं समझ सका
अब तक देखती थी मैं भी
खुली आंखों से उन्हें
आज जब दिल खोला
तो पाया एक नज़ारा ही नया
आज जब देखा
उन तूफानी लहरों का
किनारे की ओर आना
उसे भिगो कर फिर
शांति से वापिस चले जाना
दिल रो पड़ा आज मेरा
ये सब देख कर
आज महसूस हुई
बैचैनी उस समुद्र की
और तड़प दिखी लहरों में
अपने किनारे के लिए
आज आया समझ
उस किनारे का
अपने समुद्र से मिलन
और जुदाई पर आंसुओं से
किनारे का भीगना
वो लौटना उन लहरों का
दुखी मन के साथ
और निशानी दे जाना
एक उम्मीद जगाए रखने के लिए
खूबसूरत जो लगते थे
वो सब नजारे
कितने मजबूर से आज वो
नजर आए मुझे
कितना वंचित थी
कभी तववज्जो ही
ना दी थी मैंने
कभी तसव्वुर में भी
ये ना आया मेरे
ना समझ पाई मैं
वो कशिश , वो राब्ता
समुद्र और किनारे का
आज समझ आई उनकी
बेचैनी और जुदाई
और इंतजार कि वो घड़ियां
दोबारा से मिलने की।
नहीं है साथ निभाना
दोनों की ही किस्मत में
किनारे में गर ठहराव है
तो वो तैर नहीं सकता
और समुद्र सिर्फ तैरता है
ठहराव रख नहीं सकता
सीख गई हूं एक बात
और छप गई मेरे जहन में
हर खूबसूरत सा नज़ारा
संजोए होता है बहुत राज
उसे सिर्फ नजरों से नहीं
खुले हुए दिलों से देखिए
हर वो शय जो दिलों को
देती है सुकुनीयत
हर उस शय को
सिर्फ दिल से ही
महसूस करके देखिए
सिर्फ दिल से ही
महसूस करके देखिए।।
By Dr Meenakshi Saini

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