राज़ की बात
By Suvankar Dash
मैंने अफ़सानों को हक़ीक़त में बदलते देखा है कईं शोहरतमंदों को गुमनामी के साए में देखा है शायद अपनी ही हस्ती से वो अनजान रहे होंगे जिन्होंने प्यार को हमेशा ठिकाने बदलते देखा है सपनों के कतार में वाकिये को खड़े देखा है अकलमंदों का तो पता नहीं, मैंने पागलपन को दुनिया जीतते देखा है खोखले झूठ से सच को डरते देखा है मासूमों पे चालबाजों का उमड़ता असर देख मैंने दुनिया बनानेवाले को अपने किए पे पछताते देखा है ये ढलने वाली शाम से पूछो, क्यों आते ही गुज़र जाती है मैंने लम्हों को अक्सर उसके याद में तड़पते देखा है।
By Suvankar Dash

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