राग सात
By Nishant Saini
राग सात, जो साथ मिट जा..
जो रंग सात भी, सब उड़ जा..
आतिशे जो, सफ़ेद पड़ जा..
जो बर्फ भी, लाल आग सी हो जा..
जो बर्क़ भी, धरती चिर जा..
पानी भी उड़के जो, आसमाँ बन जा..
आंख जो, आँसू में बह जा..
जो चीख भी, दर्द में रह जा..
जो खुर भी, ठंडा पड़ जा..
माह भी जो, जल कर राख हो जा..
रोशनी जो, अंदेरे में छिप जा..
जो चांदनी भी, रात में लुख जा..
जो पत्ते भी, पेड़ से जड़ जा..
जड़े जो, मिट्टी में मील जा..
तब शायद काज़-ए-ज़ीस्त में आराम आए..
तब शायद दिल-ए-धड़कन ठंडी पड़ जाए..
By Nishant Saini

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