रघुवर
By Utkarsh Mishra
विकल हृदय धुंधला सफ़र
डगमग जीवन, थी कठिन डगर
कोई आस नहीं कोई पास नहीं
बेचैन मैं पुकारु रघुवर-रघुवर
अभिमान के वशीभूत मैं
निर्णय लिया अकेले चलने का
मन दुखी था मैं ज़िद्दी था
सोचा रघुवर भी ना रहा अपना
मैंने सब रिश्ते फिर संभाले
रोया भी ज़ोर से अकेले मैं
सीखा दुबारा हँसना भी
तुझसे शिकायत अपार थी
पर तु ही आस की एक किरण थी
जब सशक्त हुआ पुनः खड़ा हुआ
तब मर्म हुआ तेरा मुझको
ना हँसता मैं था, ना लड़ा मैं
वो सब तेरी ही शक्ति थी
मुझ संग हर बार मिटा तू ही
तू ही था वापस जो खड़ा हुआ
जब रोया में तेरा काँधा था
जो हँस पाया तो तेरे कारण ही
जो अकेले रहता तो मर जाता
मुझमें जीवंत था तू ही
तेरे सुवन से सजी आत्मा
पुनः सीखा प्रेम तुझसे ही
तेरे निशान अब मन मन्दिर में
मेरे तेज की ज्वाला तू ही
खुद को खोकर पाया तुझको
भलाचाहनेकोअबकुछबचाभी१
By Utkarsh Mishra

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