रंजिश-ए-उल्फ़त
Updated: Sep 20, 2022
By Mehak Mathur
रंजिशों का सिलसिला कुछ यूं मुसलसल है हमारा,
की उल्फ़त का काफि़ला अरसों से घायल है हमारा,
नजरें थकती नहीं हैं आज भी उस चांद के दीदार से,
के दिल आज भी उन रुखसारों पर कायल है हमारा,
रंजिशों का सिलसिला कुछ यूं मुसलसल है हमारा,
की उल्फ़त का काफि़ला अरसों से घायल है हमारा।
करने को इज़हार-ए-मोहब्बत जब उनसे रूबरू हुए थे,
उनके शानो पर गिरी जुल्फों की खुशबू से बेकाबू हुए थे,
रात भर जागे थे हम उनके आगोश में सोने के ख्याल से,
मदहोश उनके इश्क में कुछ यूं हुए थे,
उस एक याद में ज़हन आज भी पागल है हमारा,
रंजिशों का सिलसिला कुछ यूं मुसलसल है हमारा,
की उल्फ़त का काफि़ला अरसों से घायल है हमारा।
रह जाता था साथ जब एहसास उनका,
दिन भर रहता था जब हाथों में हाथ उनका,
किया करते थे बयां, उनके आंसू, उनकी हंसी,
समझ लेते थे जब हम हर जज़्बात उनका,
उनके हर इशारे पर मन आज भी बिस्मिल है हमारा,
रंजिशों का सिलसिला कुछ यूं मुसलसल है हमारा,
की उल्फ़त का काफ़िला अरसों से घायल है हमारा।
By Mehak Mathur

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