ये शहर मेरे गांव सा नहीं है...
By Gopalaram Dheru
हजारों तरह के शोर सें उठते हैं लोग,
यहां पंछियों की वो चहचहाहट तो नहीं है,,
सबके चेहरों पर है तनाव भरा,
यहां वो जिंदादिली मुस्कुराहट तो नहीं है,,
बनते हैं रोज कई नये दोस्त मगर,
यहां बचपन के वो चंद दोस्त तो नहीं है,,
लाखों गलियां हैं कि खो जाऊंगा यहां,
मगर गांव की उन चंद गलियों की महक तो नहीं है,,
जगता है हर एक रात ये शहर,
मेरे गांव की सुकून की वो रातें तो नहीं है,,
ये शहर मेरे गांव सा नहीं है ।।
By Gopalaram Dheru

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