ये भी क्या ज़िद्द है, कि किसान ही बाज़ार जाए
By Siya Rasik
ये भी क्या ज़िद्द है, कि किसान ही बाज़ार जाए
कभी शहर को भी बोलिए कि गाँव जाए।
सभी को बुला लिया जब तुमने कारख़ानों में काम करने,
कौन बचा है घर में जो खेत खलिहान जाए।
अख़बार ख़रीद रहे है, या ग़रीबी ख़रीद रहे है लोग
जो छपते है अख़बार में, उनके घर न अख़बार जाए।
सब चाहते है उन्हें ही मंज़िल मिले,
ऐसे ख़्वाब क्यूँ देखे जो टूट जाए।
मुझको खुद मैं शामिल नहीं कीजिएगा कभी,
मैं वो हूँ जो बिगरने के बाद बन जाए।
राहत होती है मुझे कभी कभी ये देख कर,
बच्चे काली स्लेट पे लिखते है, “चलो दुनिया बदला जाए”।
By Siya Rasik

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