यायावर
By Kanchan Tanwar
आसमां को छूने और ज़मी को नापने निकल पड़े हैं
सफर पे हम मुसाफिर अपने कदमो से
कई और हमकदमो के साथ
ठंडी हवाओ को छूते हुए बारिश में नहाते हुए
झरनो की झनझनाती सी आवाज़
ये हरयाली जैसे प्रकृति के गहने हो
को दिल में बसाये, हम बेपरवाह
जुनूनी धड़कने लिए
उल्फ़त का लुफ्त उठाते हुए
पहाड़ो को चीरते हुए
सारी दुनिया को पीछे छोड़ते हुए
हम यायावर
सफ़र पे निकल पड़े
अब लौटना कहा मुनासिब हैं
ये तो अंतहीन सफ़र हैं
हर रोज़ एक मंज़िल, हर रोज़ फिर नया सफ़र शुरू
रुकना इन जुनूनियत वाले कदमो को मुनासिब ही नहीं
थमते ही नहीं
लगता हैं जैसे रूह का मकसद ही सफ़र करते रहना हैं।
By Kanchan Tanwar

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