यादों के झरोखे से
By Rajesh Kumar Verma
जब तक थी
तेरी जां में जां
सारे दुःख मेरे तूने
समेटे अपने आंचल में।
मेरी राहों में तूने सिर्फ़
फूल ही फूल बिखेरे
खुद दर्द सहती रही वह
खुशियां बिखेरी उसने
चुन-चुन कर मेरे दामन में।
सबके घरों में
दीवारों पर टंगी देखा
मैंने तेरी तस्वीरें
पर मेरे पास नहीं
तेरी कोई तस्वीर
अब है रहती
तू सिर्फ़ मेरी यादों में।
जब यादों में तेरी
खो जाता हूं
तब तसवीर उभरती है
तेरी मेरे मन में।
धुंधला-धुंधला सा
तेरा वह अक्श उभरने
लगता है मेरी आंखों में।
कितने कष्ट उठाए
तूने मेरे लिए
न रखा ध्यान अपना
जान गंवाई तूने
अपनी मेरे लिए
नहीं तेरी कोई तसवीर
मैं कैसे अर्पित करूं
श्रद्धा सुमन तेरे चरणों में।
नहीं जाहिर
होने देता हूं किसी को
कितना अकेला हूं
मैं तेरे बिन
याद आती है
जब भी तेरी
रो लेता हूं कहीं अकेले में।
रहती हो सदा
मेरे खयालों में
मेरे साथ ही
खत्म हो जाएंगी
तेरी यादें
तेरी वो तसवीर
जो उभरती है
मेरे मन में
मेरे साथ ही विलीन
हो जाएगी तू उस शून्य में।
वैसे तो मैं ठहरा
किस्मत का धनी
डाला है जिसे तूने
मेरे दामन में
रखती है ध्यान
वो भी मेरा
खुद से ज्यादा
जैसे तू प्रश्रय
देती थी अपने दामन में।
पर जाने क्यूं आज
तेरी याद बहुत आई
न चाहते हुए भी
आंख मेरी भर आई
नहीं भूलते वो पल
जो बिताए हमने तेरे संग
रह-रह कर वो पल
याद आते हैं बहुत
त्याग कर अपनी खुशियां
तूने फूल बिखेरे थे मेरी राहों में।
By Rajesh Kumar Verma

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