यादों के गलियारे मेरे दिल के द्वारे
By Vivek Sharma
चलो जी आओ सैर करा दें बीते कुछ अफ़सानों की,
एक कहानी अलग रही है हम जैसे दीवानों की...
मेरे घर के ठीक सामने ही था उस लड़की का घर, साँवली-सलोनी सीधी-सादी लगती थी सुन्दर,
भोर भये भीगे बालों में कपडे छत पे डालने आती थी, इसी फिक्र में आँख हमारी जल्दी ही खुल जाती थी,
योगा करने की कहकर माँ से हम अपनी छत पर आते थे, चकोर के जैसे बैठ मुंडेर पे उसे निहारे जाते थे,
चंचल चितवन पावन-सा मन वो साक्षात मृगनयनी थी, स्वर्ग से उतरी रूपमती की कमर कमल की टहनी थी,
सीधे-सीधे मुझे देखने से अक्सर वो बचती थी, अलगनी पर बिखरे कपड़ों की सांसो से पर मुझको तकती थी,
नैन-मिलन मन-मोर मिलन बस कुछ पल का हो पाता था, आंटी की कर्कश ध्वनि में फिर उसे बुलावा आता था,
कि जब ये प्रेम-योग देखा अम्मा ने,
खिंचाई हो गई थी कानों की,
एक कहानी अलग रही है हम जैसे दीवानों की...
हम पढ़ते थे सरकारी में वो कॉन्वेंट में पढ़ती थी, दूरी क्यूँ है बीच हमारे बात सदैव अखरती थी,
नए वर्ष के नए सत्र में शुरू कर दिया अनशन, बाबा बोले कुछ तो खा ले क्यूँ देता है टेंशन,
हम बोले कि छीन लो गुल्लक बेचो सायकिल पर कॉन्वेंट में जाना है, फीस भले ज्यादा है बाबा पर एडमिशन वहीं कराना है,
पॉकेट मनी पर गाज़ पड़ गई पानी-पूरी कचौरी भी छूट गए, स्कूल बदल लिया हमने कुछ दोस्त पुराने रूठ गए,
पर कक्षा की बेजान दीवारों में रौनक पहली बार लगी, हुआ प्रफुल्लित ह्रदय ख़ुशी से जब आँख उन्हीं से चार हुईं,
दिल का हाल न कह पाते थे, बहुत अधिक घबराये थे, उस्तादों से प्रेरित हो एक प्रेम-पत्र लिख लाये थे
कि सर ने आर्म्स-एक्ट में धर लिया,
और झड़ी लगी फ़रमानों की,
एक कहानी अलग रही है हम जैसे दीवानों की...
इतना सब हो जाने पर अब उसका दिल भर आया था, प्रेम का अंकुर फुट चूका था जबसे सावन आया था,
अपनी छतरी याद से हम घर पे भूलके आते थे, चलते-चलते भीगे-भीगे उसकी छतरी में आ जाते थे,
मेरे लिए कुछ कहे बिना वो पगली उपवास रखा करती थी, जोड़-जोड़ के पाई-पाई उपहार दिया करती थी,
बस टिफ़िन-बॉक्स बता सकता है कि कैसा किस्सा होता था, उसके हिस्से में एक हिस्सा मेरा भी तो होता था,
मई-जून की तपती दुपहर तब शोले-सी सुलगती थी, नंगे पाँव जब छत पे वो बस मेरे लिए पहुंचती थी,
लफ़्ज़ों की ज़द में यादें भला कौन समेट पाया है, मैंने कोशिश बड़ी करी है फिर भी अक्षम ही पाया है,
कि प्यार की मूरत भोली सूरत,
वो मलिका गुलों-गुलज़ारों की,
एक कहानी अलग रही है हम जैसे दीवानों की...
सालों-साल के रिश्ते को सोचा पेटेंट करा लें हम, अम्मा से शरमा के बोले क्या ब्याह रचा लें हम,
अम्मा ने सर पर हाथ रखा पलकों में उसके गीलापन, सुनते रहे लोक-लाज, मर्यादा, समाज और परंपरा का खालीपन,
गैर-ज़ात बहू ले आये तो नाक कहाँ रह जाएगी, बेरोजगार वैसे ही हो बात शर्मनाक हो जाएगी,
दर्द मैं तेरा जानूँ ख़ुशी तेरी पहचानूँ पर बहती धारा का रुख मैं कैसे मोडूँ, युगों-युगों से चली आ रही परंपरा कैसे तोडूं,
तभी दौड़ती आई छोटी बोली - बाबा ने बुलवाया है, सज-सँवर के आना भैया अच्छा रिश्ता आया है,
जीवन के इस दोराहे पर बिपदा पड़ी अपार, इधर मेरा रोता सा दिल है, उधर घर की खुशियाँ अपरम्पार,
कि यूँ खूँखार तरह से,
सूली चढ़ गई थी अरमानों की,
एक कहानी अलग रही है हम जैसे दीवानों की...
उसके घर के हालात भी ठीक मेरे जैसे ही थे, बगावत नियति से कर न सके हम बेबस ही थे,
हम पहुंचे कदम्ब के नीचे जहाँ मुरली की तान कृष्ण ने छेड़ी थी, हाथ उठा कर पूछा हमने प्रभु ये कैसी अजब पहेली थी,
प्रेम बीज तूने फिर मुझ में बोया ही क्यूँ था, मैं आभागा स्वप्न-सेज़ पर सोया ही क्यूँ था,
इस समाज का एक द्वन्द मुझे कभी समझ न आया, राधे-श्याम जपा करते सब पर मर्म समझ न आया,
जाति-धर्म के पाशों से बता प्रेम कब छूटेगा, सिलसिला ऐसे बिछुड़न का न जाने कब टूटेगा,
क्यूँ सब कुछ लूट गया आज ऐसी क्या गलती की, कहीं दूर एक शायर की एक नज़्म सुनाई दी,
कि शमा में जलकर मिट जाना,
बस यही व्यथा परवाने की,
एक कहानी अलग रही है हम जैसे दीवानों की...
चलो जी आओ सैर करा दें बीते कुछ अफ़सानों की,
एक कहानी अलग रही है हम जैसे दीवानों की...
By Vivek Sharma

Comments