यह शहर तुम्हें ढूंढता हैं।
By Kunal Verma
अभी हम क़रीब ही कहा आए थे
की रास्ते अलग हो गए।
अभी कुछ यादें और सजाने थे
अभी कुछ निशानियां और चुराने थे।
इस शहर ने कई निशां दिए,
हँसीं के, कुछ चाकों के,
कुछ मीठी कड़वी बातों के,
दो पल की इन यादों में,
इन गलियों में, इन रास्तों में
हसी – घम का एक काफिला गूंजता हैं
यह शहर तुम्हे ढूंढ़ता है।
यह शहर तोह एक घरौंदा था,
इसे हमने ही सजाया था।
यहां इन इमारत से,
इन पगडंडी के किनारों से,
मिट्टी की एक भीनी ख़ुशबू हवा में लहराती है
बीती पुरानी पन्ने पलट कर,
उन लम्हों का, तुम्हारा, इत्र याद दिलाती हैं।
यहां के चौक – ओ – बाज़ारों में,
नुक्कड़ और किनारों में, एक सौंधापन हैं।
जहां उस टपरी पर, कुल्हड़ में वो फ़िका चाय छंता हैं,
बरसता हुआ वो पल, बिता हुआ वो कल
यह शहर तुम्हें ढूंढ़ता हैं।
अब जब भी उन गलियों से गुजरता हूं,
उन लम्हों को, नम आंखों से, मुस्कराते हुए ढूंढता हूं,
इस शहर की, हवा में बिखरे ज़हर,
की कशे यह रग रग दम भरता हैं,
बिलखता हुआ रूह, तड़पता हुआ खून
और यह शहर तुम्हें ढूंढता हैं।
By Kunal Verma

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