यह प्रश्न!
By Shruti Lodha
यह जुल्फें इस हवा से यह प्रश्न करने आई
कहने को लाख बातें थी मगर सिर्फ इल्ज़ाम लगा पाई ।।
कुसूर क्या इस एहसास का है जो चेहरे पर ये यू छाई
बसेरा क्या इन आहटों का है जो इन प्यार के धागों में समाई
आसमान की चादर तले क्या तू बेरुख खड़ी है जो बंधी हुई यह जुल्फें भी शरमाई
निकली मेरे इन उलझनों से क्या सांझ में मेरे संग बैठ पाई
मैं गई थी समंदर से शिकायत करने मगर लहरों में भी तेरी परछाई ।।
कहा फिर हवा ने मुझसे कि बस अब तेरे समय की घड़ी आई
तेरे इल्जामों की ख्वाहिश में, मेरे जवाब का में सवेरा लाई।।
मेरी बातों में डूबी यू चेहरे पर तुम सिसक सी आई
इन प्यार के धागों में तो मेरी रूह है समाई
न जाने मेरी इस चादर में तू क्यों शरमाई
सुलझी हुई निकली उन उलझनों से जब सवेरे की आदत मुस्कुराई
भले ही शिकायत करी तूने समंदर से मेरी मगर पुकारने पर भी मैं तेरे साथ आई।।
मगर,
मैं छू कर गई तुझे तो फूलों सी महक आई
क्या मेहमान बनकर इन जुल्फों में कोई कली सजने आई
पूछा जब मैंने उसकी नादान पंखुड़ियों से
तो सुनकर जवाब यह हवा भी मुस्कुराई।।
कहा उस खुशबू ने की,
गुजर रही थी तुम हवा के संग तभी नजर में कांटों पर सजी मैं दी दिखाई
आंखों के सामने छाई तुम समझ नहीं पाई
पुकारा इस तरह इन जुल्फों ने मुझे की
बसने को इसके शहर में यह नन्ही सी कली आई
हवा ने पूछा सवाल कि किस हक से मैं यहां गई सजाई
कहा इन जुल्फों ने कि
ऐ हवा ! तेरे नूर को बढ़ाने शहर में नई खुशबू समाई
By Shruti Lodha

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