मोहब्बत एक गुनाह
By Bhavesh Agarwal
अंजान अलग सबसे मैं एक बात सोचता हूं
पाक हैं जो बातें, हर पल उन्हें सोचता हूं
गाई जाती हैं तबीयत आवारों की खूब
मैं शांत एक तरफ तकबीर सोचता हूं
कुछ लोग बे मिसाल कहते हैं इश्क़ को
मैं बिन इश्क धरा को जन्नत सोचता हूं
बेमतलब की हर तलब को प्यार फरमाते हैं
बेसहारों को देखते मैं कुफ्र सोचता हूं
न जल्दी, न देरी किसी की सुकून भरी ज़िंदगी में
वक्तकेपाबंदइश्कको "भाव" गुनाहसोचताहूं
By Bhavesh Agarwal

Comments