मोमबत्त्ती सी मैं
By Kavita Bhatt
मोमबत्त्ती सी मैं
स्नेह की लौ में
अक्सर पिघल जाती हूँ I
पिघल कर जो थोड़ा बहुत
मजबूत होती हूँ धरा पर
फिर खुरचने पर भी
नहीं आ पाती अपने मौलिक अस्तित्व में I
जो बह गया, बिखर गया, पिघल गया
फिर नहीं वो रहता मेरे अस्तित्व में
इस तरह स्नेह की लौ
धीरे-धीरे मुझे
निरंतर समेट लेती है I
जब टकराती हूँ मैं शून्य की परिधि में
तब नहीं रहता कोई घाव या फिर कोई पीड़ा I
अक्सर सोख लेती हैं वो पिघली मोम
मेरी हर उस पीड़ा को I
मोमबत्त्ती सी मैं
स्नेह कि लौ में
अक्सर पिघल जाती हूँ !
By Kavita Bhatt

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