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मोटी किताब छोटे पन्ने

Nov 1, 2022
1 min read

By Arsh Gupta



मैं मेरी किताब, वो अपनी किताब, बेताब हो पढ़ रहे थे | मेरी थोड़ी ज़्यादा मोटी थी उसकी थोड़ी लंबी थी| मुझे उससे पहले ख़तम करनी थी| मै पन्ने गिन रहा था| एक पन्ने से दूसरे पन्ने का मेरा सफ़र काफ़ी छोटा था | शायद उसका पन्ना शब्दो से भरा था, मेरे थोड़े खाली थे, मेरे पन्ने छोटे थे और उसके लंबे | वो हर लाइन जी रहा था और मै पन्ने पी रहा था |



मुझे हर पन्ने मे बेचैनी थी| मुझे पन्ने नही किताब पढ़नी थी | उसने जान लिया था हर पन्ना ही किताब है | मैने किताब ख़त्म करने की जल्दी मे पन्ने फाड़ दिए, वो हर पन्ने में रोज़ किताब ख़त्म कर रहा था | मुझे हर ख़त्म होता पन्ना सुकून ज़रूर देता था पर हर पन्ना खाली लगने लगा था | उसके लिए हर पन्ना नया था |

मैं खुदको पढ़ने नही दे रहा था | और वो किताब बनता जा रहा था | मुझे लगा शायद मेरी किताब ही खराब है | पूछा तो पाया वो भी वही किताब पढ़ रहा था, बस मुझे मोटी और उसे लंबी लग रही थी |


By Arsh Gupta




 
 
 

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