मैला और काला
By Shivam Mishra
भीतर तक घोर अंधेरा है, तुझको क्या दूँ उजाला मैं
तू सोमरस की चाह करे,
हूँ भरा हलाहल प्याला मैं।
उगते सूरज की चाह तुझे, मावस की काली रात मेरी
तू मस्जिद की ओर निकलता है,
और जाता हूँ मधुशाला मैं।
तू बागीचे में फ़ूल सा खिल, मैं जंगल सा आज़ाद उगूँ
मेंढक सा - कुआं ही राज्य तेरा
हूँ हाथी सा मतवाला मैं।
क्या खौफ़ मुझे ग़र सच बोलूँ? सच कहने से क्यूँ डरता क्यूँ?
घर में छुपकर तू दिया जला
हूँ कुंड की पावन ज्वाला मैं।
तू चांदी की थाली में खा, मैं सूखी रोटी और नमक
तू मंदिर के छप्पन भोग
हूँ भूखे का निवाला मैं।
बन भीड़ का हिस्सा, हो जा गुम
ना पूछो कुछ! ना बोलो कुछ!
तू झूठ सा चारों ओर चमक,
सच सा मैला और काला मैं।
By Shivam Mishra

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