मैखाने की गुलाब
By Ankit Kumar Roy
ऐ मैखाने में लगी गुलाबों,
तुम दिल्लगी न करो,
कोई आंधी सा आएगा ,और
तोड़ के चला जायेगा।
तुम्हारे खुशबुओं की चाह नहीं यहां किसी को भी,
यहां तो बस तुम्हारे पंखुड़ियों के प्यासे आते हैं।
जो अधरो से तुमको लगाना तो चाहते हैं,
पर गुलदस्ते में घर के सजाना नहीं।
निचोड़ कर फैंक देंगे तुमको ,
सड़क के किसी कोने में,
और महकाते फिरेंगे बदन अपना ,
खुशबू से तुम्हारे।
वक्त है अगर अब भी, तो
लौट जाओ उस माली के पास,
जो कांटे तक चुन लेता था
बदन से तुम्हारे ।
By Ankit Kumar Roy

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