मैं हूं
By Amit Kanthi
जब वो सहमी सी आवाज़ में
अपने होने के आवाज़ को बोल उठी
सूरज के उगते से ढलते तक
वक़्त के बीतते धीरे-धीरे दिनों के गुजरते
इंतजार की नाकामियाबि के चलते
वो चिल्ला उठी, और इस कदर चिल्लाई
कि जैसे उसने हो हुंकार भरी |
दर्द झलकाती अपने आंसुओं से,
रोदन करती अपने आक्रंदन भरे स्वरों से,
छलकती बिलखती हठ करती हुई,
और कुछ न सही, भिक्षा माँगती हुई,
अपनी वेदना में पीडा में, अपनी निराशा में
आशा से भरी आँखों को सजाए रखती,
एक लौता ऐसा वजूद दुनिया में,
जो अपने ही होने को मिटाना चाहती|
आँखों में भरी उस उम्मीद के लिए,
उनमें पीडा से बह रहे अक्षुओं के लिए,
मजबूर वो अपने हाथ फ़ैला भीख माँगती |
हर आते जाते गुजरते को उम्मीद से देखती,
उसे बतलाने समझाने मनाने की कोशिश करती,
उम्मीद लगाती, कि फ़ैले हाथ मेरे शायद,
ये फ़ैले हाथ मेरे, शायद ये ताकत रखती,
कि गुजरते राही का कोई तो दिल खटका ही लेती |
चिल्ला-चिल्लाकर वो कहती है, मैं हूं|
दिखती नहीं कहीं मैं तुझको, पर मैं हूं, |
मैं सिर्फ़ तुझमें नहीं हर सब में हूं,
अगर मैं तुझमें तुझे महसूस हूं,
तो मैं औरों में तुझे क्यों नहीं ?
वो चिल्लाकर बदहवासी में कहती रही,
चीखती रही, हाथ फ़ैलाए आंसू बहाती रही,
बेखौफ़ अपने जमीर के, अपने गुरूर के,
वो बार-बार बेशर्म होकर, हाथ फ़ैलाती रही,
भरी दोपहर में आँसू बहाती रही,
वो अपने होने को हर कोशिश जताती रही,
आँसुओं से, अपनी वेदना से, अपने फ़ैले हुए हाथों से,
वो चीखती रही, चिल्लाती रही
मैं भूख हूं, मैं भूख हूं, मैं भूख हूं|
By Amit Kanthi

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