‘मैं...सिंधिया स्कूल’
By Seema Sharma
क्यूं भई क्यूं?
ये क्या फालतू का विचार ले आईं तुम...
जानती भी हो तुम क्या कह रही हो ?
डेढसो से भी ज़्यादा वर्ष पुराना है यह स्कूल ...
राजाओं महाराजाओं द्वारा बनाया गया।
तथा उनके बच्चों के लिए बनाया गया।
तुम कौन?
न तुम कोई रानी,
और ना ही कोई राजकुमारी,
फिर भी तुम पढ़ लीं,
इस इतने बड़े स्कूल में।
चलो यहां तक तो ठीक है।
तुम्हारे पिता यहाँ शिक्षक थे,
तो तुम्हें लड़की होकर भी मौका मिल गया,
इस श्रेष्ठ, लड़कों के स्कूल में,
पढ़ने का।
निष्चय करने वाले ने सोचा होगा...
कहां जाएंगी ये शिक्षकों की कन्याएं..वो भी किले की घाटी उतर उतर कर ?
चलो उनको भी यहीं पढ़ने का दे देते हैं मौका...
फिर क्या था
पवार साहब के ज़माने से
खुल गए बंद दरवाज़े सिंधिया स्कूल के ...
शिक्षकों की बेटियों के लिए ।
पर ये क्या तुम तो आगे बढ़ती ही जा रही हो।
रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं।
ठीक है... तुम्हें मौका मिला,
तुम किले पर रहीं और
ग्यारहवीं कक्षा पास कर ली।
बस अब तो पीछा छोड़ो इस स्कूल का...
बहुत कुछ दे दिया इस
राजा महाराजाओं के स्कूल ने तुम्हें।
और क्या चाहिए??
तुम तो बस हो कि पीछा ही नहीं छोड़ रहीं।
स्कूल ने तुम्हें जीवन के लिए तैयार कर दिया,
अपना नाम तुम्हारे नाम के साथ जोड़ दिया,
एक पहचान दे दी,
और तो और...कई सारी जान पहचान भी दे दी।
जहां जाती हो, इतरा इतरा कर कहती फिरती हो,
‘आई एम फ्रोम सिंधिया स्कूल’
और बस सब तुम्हें दूसरी ही
नज़रों से देखने लगते हैं,
मानो तुम, तुम नहीं,
बल्कि सही में, कहीं की
महारानी हो।
तुम समझती क्या हो अपने आपको?
ठीक है... तुम्हारे पिताजी यहां शिक्षक रहे,
बहुत बेहतरीन शिक्षक रहे।
आज भी उनके इस दुनिया से जाने के बाद,
उनके विद्यार्थी तो उन्हें याद करते ही हैं,
परंतु उनकी यादें यहां की हर चीज़ में भी बसी हुई हैं।
वो भुलाए नहीं भुलाए जाएंगे।
क्यूंकि उन्होनें अपना काम,
अत्यन्त निष्ठा से और निश्छल भाव से किया।
पर तुमने क्या किया?
सिवाय इसके कि तुम्हें
उनकी सुपुत्री होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
परन्तु आज तो तुमने हद ही कर दी।
कह रही हो..
‘मैं सिंधिया स्कूल हूं’।
अरे तुम हो ही क्या ?
एक आम लड़की ही तो हो।
कल को हर ऐरा गैरा यहां आकर...
किले की दीवारों से चिल्ला चिल्ला कर कुछ भी कहने लग जाएगा।
‘मैं ये’....
‘मैं वो’....
समझ नहीं आ रहा तुम्हें क्या कहूं?
बुद्धिहीन कहूं?
या स्वार्थी कहूं?
या फिर निपट अनाड़ी कहूं?
या फिर कहूं चतुर...
लगती तो नहीं हो तुम
इनमें से कुछ....
चलो तुम ही बता दो...
देखें क्या तर्क है तुम्हारा?
तुम क्यूं हो सिंधिया स्कूल?
अब आए आप रस्ते पर।
पहले ही पूछ लेते...
बेकार में ही इतना वक्त बर्बाद किया।
अपना भी... और मेरा भी।
चलो..पूछ ही रहे हो तो सुनो।
कभी देखा है दरिया को, नदिया में मिलते हुए।
और फिर नदिया.. को समुद्र में मिलते हुऐ।
और फिर समुद्र को उन सबको अपने में समोते हुऐ।
समुद्र तो कभी नहीं कहता नदिया से...
कि तुम क्यूं आ मिलीं मुझमें?
मैं तो अकेला ही ठीक था।
ना ही नदिया कहती है दरिया से...
‘जाओ मुझमें ना समाओ’।
बल्कि विशाल हृदयी समुद्र कहता है नदिया से...
‘आओ मेरा अस्तित्व तुमसे ही है,
तुम नहीं तो मैं कुछ भी नहीं’।
अब आया समझ में....
क्यूं हूं मैं सिंधिया स्कूल...
और समझायूँ क्या?
तो सुनो...
‘मैं हूं वो...
इक बूंद दरिया की,
जिससे नदी बनी।
और वो इक बूंद नदी की...
जिससे समुद्र बना’।
सिंधिया स्कूल क्या?
वो भी तो नदिया की
और समुद्र की तरह..
‘सीमा’ रूपी बूंद से है.. बना।
तो हुई ना ‘मैं सिंधिया स्कूल’।
मैं सिंधिया स्कूल से..
और हां...
सिंधिया स्कूल मुझसे...
तो मान गए ना..
‘मैं...सिंधिया स्कूल’
By Seema Sharma

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