मैं संतुष्ट हूँ माँ
Updated: Jul 30, 2025
By Viraj Kapoor
सूने रा स्तों पर को यला चढ़ा दि या ।
जि नसे ना सुनना पा ए,
उन्हें हमा रे ही दि ये हा थों से बंदी बना दि या ।
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मैं संतुष्ट हूँ माँ ,
यहाँ बो झ नहीं हैं।
मेरे जि स्म को , हृदय से पुण समझने वा लों की सो च नहीं है,है
वह आसूँ नहीं हैं, वह ची खें नहीं हैं।हैं
हमा रे बदन पर हमा रे रखवा लों के नि शा न नहीं हैं, और यहाँ मेरा हर टुकड़ा बि का ऊ नहीं है।
मैं संतुष्ट हूँ माँ ,
यहाँ बो झ नहीं हैं।
अगर कुछ है तो वह इज़्ज़त है, उन लकड़ि यों की आँखों में,में
हम जैसी चट्टा नों के लि ये।
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पी छे मुड़कर देखती हूँ, तो तेरी उँगलि यों की सरलता व उस ममता की या द आती है, जि सने कि सी
चि ड़ि या को देख कभी जी ने की झलक दि खा ई थी ।
मगर फि र उसी चौ रा हे पर दि खती वह उँगलि याँ हैं, जि न्हों ने तेरी बेटी पर हैवा नि यत के तौ र पर भी
कभी नज़रें टि का ईं थी ।
तभी झट से आगे मूढ़ लेती हूँ माँ ,
क्यों कि यहाँ को ई बो झ नहीं हैं।
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उस आग में तेल के छा ले नहीं हैं।
घर ला कर, सजा कर और फि र रो ज़ को सने वा ले घरवा ले नहीं हैं।
अगर कुछ है,
तो वह इज़्ज़त है, उस चिं गा री की आँखों में मेरे इस रो ष के लि ए।
हाँ मैं संतुष्ट हूँ माँ ,
यहाँ बो झ नहीं हैं।
By Viraj Kapoor

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