मैं तुमसे प्रेम करती हूँ
By Anisha
मैं तुमसे प्रेम करती हूँ
पर यह बात अधरों पर लाऊँ कैसे।
मौन की अँधेरी चौखट पर
शब्द के दीप जलाऊँ कैसे।
आँखों से अश्रु की कविता बहाऊँ
या अधरों से विरह के गीत गाऊँ,
पत्र लिखूँ तुम्हारी स्मृति में या
ह्रदय से तुम्हें पुकार लगाऊँ,
तुम ही कहो न, प्रियतम,
अब तुम्हें बुलाऊँ कैसे।
तुमसे प्रेम करती हूँ
पर यह बात अधरों पर लाऊँ कैसे।
कभी फूलों से श्रृंगार करती हूँ,
कभी आभूषणों से मन भरती हूँ,
कभी तजकर साजो-श्रृंगार सारा
बिरहन बन नृत्य करती हूँ।
अब तुम्हारे स्नेहिल स्पर्श के बिना
मैं भला खुद को सजाऊँ कैसे।
तुमसे प्रेम करती हूँ
पर यह बात अधरों पर लाऊँ कैसे।
तुम पढ़ लो न उर मेरा
चीर दो न तुम यह अँधेरा,
लौ जलाकर प्रेम की
जला दो इसमें अस्तित्व मेरा।
कि खुद से पराई हुई इस मैं को
तुम बिन अपना बनाऊँ कैसे।
तुमसे प्रेम करती हूँ
पर यह बात अधरों पर लाऊँ कैसे।
मौन की अँधेरी चौखट पर
शब्द के दीप जलाऊँ कैसे।
कि मैं तुमसे प्रेम करती हूँ
पर यह बात अधरों पर लाऊँ कैसे।
By Anisha

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