मैं तीन आदमी को जानता हूँ।
By Siya Rasik
मैं तीन आदमी को जानता हूँ।
एक वो जो दाएँ देख रहा है क्यूँकि दाएँ उसका संगठन देख रहा है, उसकी जात और धर्म देख रही है
कहते है, उसके पूर्वज भी दाएँ देखते थे और दाएँ देखने का ज़माना है।
और तो और दाएँ देखने से सामाजिक सीढ़ी और नुकीली होती जाएगी,
और फिर हम सब दाएँ देखने लगेंगे
दूसरा आदमी बाएँ देख रहा है क्यूँकि कुछ ताकतवर संगठित लोग दाएँ देख रहें है
कहते है बाएँ देखने से ‘सामाजिक बराबरी’ होती है, फ़िर सीढ़ी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी,
मगर बाएँ देखने वाले भी बराबरी करते करते कई बार बहुत नुकीली सीढ़ी बना देते है,
और फिर कुछ बाएँ देखने वाले दाएँ देखने लगते है।
तीसरा आदमी अजीब है। कभी बाएँ देखता है कभी दाएँ।
लोग कहते है वो केंद्र में है। मगर उसका केंद्र खुद बाएँ और दाएँ होता रहता है।
अब आप सोच रहे हूंगे “मैं कौन हूँ”
मैं वो हूँ जो तीनों को देख रहा हूँ। कभी चौराहों पे, कभी आंदोलन में,
कभी रोटी की क़तार में, कभी पैसों की लूट में
और सोचता हूँ, मैं किधर देखूँ ‘LEFT-RIGHT-CENTER’
फ़िर तभी “काम” आ जाता हूँ
कभी धान रोपने चला जाता हूँ, कभी मज़दूरी करने तो कभी सीमा पर सुरक्षा करने।
By Siya Rasik

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