मैं जीतूंगा
By Siddharth Janartha
लक्ष्य दूर है आंखों से
फिर भी चलते जाऊंगा मैं
प्रेयसी दूर है बाहों से
फिर भी मधुर कंठ से गाऊंगा मैं
जीवन रणभूमि है माना
माना मुंह की खाऊंगा मैं
जीवन रणभूमि है तो क्या
बार-बार यहां आऊंगा मैं
सूखी खेती, बंजर धरती
मेहनत से अपनी मैं सींचूगा
मैं जीतूंगा, मैं जीतूंगा
By Siddharth Janartha

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