मैं जीत जीतने आया हूं
By Yogesh Kumar Pradhan
ऐ मेघ धरा,घनघोर घटा
तुझसे लड़ने का शौक नहीं।
तूफानों से भिड़ने का भी
मेरा कोई शौक नहीं।
मार्ग सुगम की आस नहीं
पथ दुर्गम मुझको भाता है
मैं पथिक अडिग हूं,आंधियों से
लड़ना मुझको भी आता है।
नभ से ऊंची ले उड़ान
मैं पर स्वतंत्र फैलाऊंगा,
और गिरी की चोटी पर मैं
परचम हजार फहराऊंगा।
मैं जीत जीतने आया हूं
न हार मान थक जाऊंगा।।
लहरों में वो बात नहीं कि
मार्ग में बाधा डाल सकें,
और आंधियों में वो धार नहीं
कि पंख मेरे वो काट सकें।
लहरें पर्वत सी हो विशाल
या पर्वत ही हो सामने,
मैं लहर भेद, मैं शिला काट
मार्ग नवीन बनाऊंगा,
नैया डूबे लाख मेरी
मैं तैर के साहिल पाऊंगा।
मैं जीत जीतने आया हूं,
न हार मान थक जाऊंगा।।
हां नहीं कोई अरिहंत यहां,
है मुझमें भी अभिमान भरा,
उस अभिमान के मान का मेरा
फर्ज़ अभी तो बाकी है,
और धरती मां से ममता का,
एक क़र्ज़ अभी भी बाकी है।
तप कर अनल में ही तो
कनक और चमकता है,
विपदाओं को पार कर ही,
मानव वीर निकलता है।।
है निश्चय मेरा अडिग,अटल
रगों में अजब रवानी है,
आसमान को आंख दिखाऊं,
ऐसी उड़ान लगानी है।
अंधकार हो गर अनंत,
मैं दिनकर सा खिल जाऊंगा
मैं जीत जीतने आया हूं,
न हार मान थक जाऊंगा।।
By Yogesh Kumar Pradhan

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