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मैं खुश हूं…

Nov 23, 2022
6 min read

By Dr. Shraddha Tripathi


मैं खुश हूं…

मैं खुश हूं , अपनी जिंदगी में,

और शायद तुम भी होगे,

उलझी रहती हूं जिंदगी की भाग दौड़ में

और शायद तुम भी होगे,

बच्चों के स्कूल पी टि एम में जाना है

लाॅन का टपकता नल ठीक कराना है

एक स्कोपस पेपर भी छपाना है

अबकी एन्वरसरी कहां मनाना है..

सोचती रहती हूं यही सब..

और शायद तुम भी होगे,

इस मैच्योर हो चुके मन में और तुम में

सच बतलाओ कभी याद आती हूं क्या मैं.....

वो होली का रंग ,जो तुमने बड़ी हिम्मत कर के लगाया था....

वो पहली बार जब मेरा फोन मिलाया था....

जब तुम्हारी नौकरी लगी थी और मैं खुशी से रो दी थी...

वो हर एक लम्हा जो हमने संग बिताया था....

ये सब आज भी याद करती हूं

और शायद तुम भी होगे....

सुना है अपने बीबी बच्चों से बहुत प्यार करते हो

उन्हीं के लिए यूं दिन भर खटते हो...

पर कभी इस शादी- ब्याह, लड़के -बच्चे, नौकरी -पैसा

ट्विटर-इन्सटा,कर्तव्यों- अधिकारों से बहुत दूर

किसी आम के पेड़ के नीचे या गंगा के किनारे

पीसियो वाले फोन पे या किसी किताब के बहाने

तुमसे मिलने की, घंटो बतियानें की

अक्सर ख्वाहिश करती रहती हूं...

और शायद तुम भी होगे......



अकेला ही रहूँगा...


जीवन की दोराहों में...

उलझन के चौराहों पे...

अकेला था.....अकेला हूँ.. अकेला ही रहूँगा...


उमड़ घुमड़ कर देते दस्तक,

कुछ प्रश्न मेरे अन्तर्मन में...

खामोशी में लिपटे,

करते कोलाहल जीवन में...

खोजने इन जबाबों को....

अकेला था.... अकेला हूँ... अकेला ही रहूँगा.....


जिंदगी की तालीम का,

हर कोई त़ज़ुर्बेकार यहाँ...

बस हम पे छाई मुफ़लिसी,

करनें हाल-ए-दिल बयां...

दबाता इन गुबारो को....

अकेला था.... अकेला हूँ... अकेला ही रहूँगा...


कुछ लोग हैं....

जो खुद से ज्यादा हमसे इश्क करते हैं,

पर उनसे भी...

ये उलझन हम कह न सकते हैं, क्योंकि

समझने इन जज्बातों को....

अकेला था.... अकेला हूँ... अकेला ही रहूँगा..


परमात्म से एकात्म की,

इस क्लिष्ट अनवरत प्रक्रिया में...

कर्म की पतवार लेकर,

बैठ कर जीवन नइया में...

भवपार करनें इह बंधनों को....

अकेला था... अकेला हूँ... अकेला ही रहूंगा....


जीवन की दोराहों में...

उलझन के चौराहों पे...

अकेला था.....अकेला हूँ.. अकेला ही रहूँगा...






















घर की याद आती है...

जब अकेले खाना खाते हैं तो घर की याद आती है...

घर से दूर त्योहारों मे घर की याद आती है...

जब सुबह काम के लिये उठना होता है ,

'मां थोड़ी देर सो लेने दो न ' कहने की याद आती है.....

आफिस मे टारगेट पूरे करते करते ,थकते और गिरते...

पापा नहीं होगा मुझसे कहने की याद आती है.....

बेशक खाते है हम खाना होटल या आंटी के हाथ का.....

पर घर के मट्ठे के आलू की याद आती है....

इन्टरनेट युग मे हो जाती है चैटिंग लेकिन....

मां के पेट से चिपक जाने की याद आती है..........

बड़े झंझट है जिंदगी के ...

सच मे इन्हें छोड़ के घर लौट आने की याद आती है.... कई बार सोचते हैं

कि चलो कम कमा लेगें पर साथ रहेंगे......

नौकरी न सही बिजनेस करेंगे...

पर फिर कुछ बात याद आती है...

बचपन से पता है कि हम ख्वाब है आपके......

हम पर ही टिके हैं,अरमान मां-बाप के...

पता है बूढ़े होते पैर थक जाते है....

पर मेरे बच्चे क्या करते है ये वो गर्व से बताते हैं.....

हमें बनाने मे झोंक के अपनी जिंदगी,

हमारी छोटी सी सफलताओ मे खुश हो जाते हैं...

उनसे मिलते हैं हम अब भी जब कभी,

अपना 'रिपोर्ट कार्ड' ही तो दिखाते हैं......

हमने भी बड़ा सा घर ये सोच के लिया कि हमारे साथ रहो आप लोग....

पर इन चार कमरों को आप लोग घर क्यों मान नहीं पाते हैं....

जब भी कहो साथ रहो आ के .....

तो क्यों बहाने बनाते हैं......

मां पापा... हम बहुत प्यार करते हैं आप से.....

फिर भी इस दुनियादारी के चक्कर मे हम साथ क्यों नहीं रह पाते हैं......

अम्मा होने की सफलता....

कभी कभी उलझन में पड़ जाती हूँ

देख कर ये भाग दौड़ ,ये रेस..

जहाँ हूँ वहाँ आस पास बस यही प्रश्न ,यही सवाल

कान में पड़ते रहते हैं....

पडा़ई ,लिखाई... स्कूल ,एडूकेशन

कैरियर, प्लानिंग और इनंवेस्टमेंट...

नन्हे से तुम से बोलती हूँ, जब वो शब्द

जो मैंनें सीखे, अपने माँ - पापा, बाबा, दादी या नानी से

वो मुहावरे जो मुझे खुशी देते हैं

तुमसे बोल देने पर, अचानक चुप हो जाती हूँ...

ये सोच कर... कहीं तुम बस यही सीख न लो...

कहीं तुम्हारी बोलचाल में ये शब्द हावी न हो जायें...

कहीं तुम वो न हो पाओ जो हो सकते थे....

कहीं ये ,कहीं वो...

इस कहीं कहीं के चक्कर में

मेरे बच्चे ,बहुत डरी हूँ मैं...

अपनी पूरी जिंदगी....

और अभी भी डरती ही रहती हूँ....

पर तुम मत बनना मुझसा....

मत डरना ये हिंदी और इंगलिश से....

मत सोचना जो ये रेस है...

बस दौड़ने की...

कुछ बनने की ,कुछ बन के रहने की....

मत जीना किसी और के सपने किसी और की चाहते....चाहें वो हम ही क्यों न हों तुम्हारे अम्मा पापा....

हमारे सामने बडे़ मसले आयेगें,

बडे़ सवाल किये जायेंगे...

कि आपका बच्चा क्या सीखा ,क्या पढा़, क्या बना????

तुम मत उलझना इन सब में

तुम बस वो पढ़ना जो भी मन करे...

वो बनना जो बन सको....

इस रेस और संग्राम से आगे भी जिंदगी है...

जीवन का उदेश्य

बहुत बडा़ है...इस बनने और होने से कहीं बडा़

उस अंतरआत्मा की यात्रा...

उसमें तुम सफल हो और आगे बढो़

... तुम्हारी ये मुस्कान

शाश्वत हो ,अमर हो

बस यही , यही है तुम्हारी अम्मा की अम्मा होने की सफलता....


ये दो दिलों की चाह है…

तुम कहो हंगामा इसे या मैं कहूं अफवाह है

लफ्ज है खामोश फिर भी ये दो दिलों की चाह है


ये वीरानियों में खिल उठे फूलों के बाग हैं

ये खुली आंखों में सजे प्यारे से ख्वाब हैं

ये झुलसती दुपहरी में फाग की फुहार है

या उलझे उलझे जीवन में आई फिर बहार है

तुम कहो मंजिल इसे या मैं कहूं बस राह है

लफ्ज है खामोश फिर भी ये दो दिलों की चाह है..........


यह लोंगों की फुसफुसाहट है या खबर की सनसनी

हर कोई पूछता है ये आग दिल में कब लगी

क्यालफ्ज है दूं जबाव सबको बस हो जाती मौन हूं

बोल दो तुम ही आज मैं तुम्हारी कौन हूं ?

तुम कहो गजल इसे या मैं कहूं दिल की थाह है

लफ्ज है खामोश फिर भी ये दो दिलों की चाह है........


संस्कृति के संचार हो तुम, मैं नवयुग की क्रांति हूं

तुम परिवर्तन के दावानल ,मैं विश्व व्यापी शान्ति हूं

तुम पहनोगे वासंती वेश यदि मैं रणदुंदुभी बजाऊंगी

तुम इस माटी के लाल मैं इस माटी में मिल जाऊंगी

तुम कहो नवजाग्रति इसे या मैं कहूं बस आगाह है

लफ्ज है खामोश फिर भी ये दो दिलों की चाह है........


प्रेम का प्रतिरूप तुम , मैं भावों की दासी

तुम पुजारी मन मंदिर के मैं शुचिता की प्यासी

तुम दीप सा बांटों उजाला, मैं स्नेह बन जलती रहूंगी

फहराओ तुम युग पताका, यह प्रार्थना मैं करती रहूंगी

अब मंजिलें हैं एक अपनी,एक ही अब राह है

लफ्ज है खामोश फिर भी ये दो दिलों की चाह है.....






ये गुजरता जमाना.....

बड़ा याद आता है वो गुजरा जमाना

वो इश्क में पड़ना,वो मुहब्बत का हो जाना.. ‌‌


वो गाना जो मैंने गाया था किसी को याद कर

जब तुममें देखा था ,इक इंसान सबसे अलग

यूं ही अचानक उस जलसे में आना...

वो तुम्हारा फ्लर्ट करना,वो मेरा मुस्कुराना....

बड़ा याद आता है वो गुजरा जमाना....


मेरे माथे की बिंदिया,वो तेरा रंग केसरिया

तेरे नयनों की भाषा, दिल में एहसास छिपा सा...

वो किस्से वो कहानी,वो बातें सुहानी

वो मेरी चूड़ी का खनकना,वो सिक्को का बिखर जाना..

बड़ा याद आता है वो गुजरा जमाना....


वो कसमें, वो वादे,, मजबूत इरादे

कुछ बनने का जज्बा, कुछ हो जाने की ज़िद

जिन्दगी की कशमकश में….

वो हर रोज टूटना,वो हर रात सम्हल जाना

बड़ा याद आता है वो गुजरा जमाना....


वो हल्दी वो कंकन, सात जन्मों का बंधन

वो सप्तपदी के कदम,वो सारे वचन

प्रेम की परिणति में...

वो तेरा घूंघट का उठाना,वो मेरा तुझ में पिघल जाना. ....

बड़ा याद आता है वो गुजरा जमाना....


वो घर ग्रिहस्ती की झंझट,तू- तू, मैं- मैं और खटपट

वो पर्दे, वो चद्दर, दिल में बसता अपने सपनों का घर

अपने अपने फोनों में बिज़ी हम....

वो मेरा प्रपंच का करना, वो तेरा खामोश हो जाना.....

बड़ा याद आता है वो गुजरा जमाना....


वक्त गुजर रहा है अपनी ही चाल से

पल बदल जाता है इक और साल में....

जाने तुम किस मिशन के पीछे

जाने मैं किस ख्वाव में खोई...

तुम्हारा खुद में डूबे रहना, मेरा न खुद से निकल पाना..

जी सको तो जी लो हर पल

ये गुजरता जमाना.....


By Dr. Shraddha Tripathi





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