top of page

मैं क्यों इतना मुस्काता हूँ

Dec 19, 2022
2 min read

Updated: Jan 12, 2023

By Aditya Jha





वो कहते हैं मुस्काता हूँ

बस यूँ ही हस्ते जाता हूँ

हर फ़िक्र से दूरी बनाता हूँ

मैं क्यों इतना मुस्काता हूँ


चिंता विष सब मैं पी लिया

दुःख बंधन से मुख मोड़ लिया

सुख चैन सभी का ज्ञाता हूँ

इसलिए इतना मुस्काता हूँ


कहते हैं मुझपे सबकुछ है

न जाने कैसे हर सुख है

जो चाहूँ सबकुछ पाता हूँ

तो इतना मैं मुस्काता हूँ


ये बातें मैं भी सुनता हूँ

अनजाने विचार जब बुनता हूँ

पर जन से सब छुपाता हूँ


कि क्यों इतना मुस्काता हूँ


हर बात मन में दफनाता हूँ

ये सब कहते मुस्काता हूँ

पत्थर सम  जो ह्रदय हो चला

उसको भी मैं छुपाता हूँ

तब यूँ  ही मैं मुस्काता हूँ


क्या समझाना क्या बतलाना

क्या निज व्यथा है सुनाना

निज चोट पे रोना आया जब

तब भी हसकर दिखलाता हूँ

वो कहते हैं मुस्काता हूँ

पर कैसे मैं मुस्काता हूँ


जब जब विश्वास है दिखलाया

तब तब है घात को प्राप्त किया

जब जब पर का सहाय हुआ

तब तब परित्याग का पात्र हुआ





जब निज नैंनो में नीर भरे

जब जिह्वा पे बस धीर रहे

किसको फिर क्या बतलाता मैं

किसको निज बोझ दिखाता मैं

बस चुप होकर रह जाता हूँ

और मंद मंद मुस्काता हूँ


आँखों को अश्रु  प्राप्त हुए

तो निज हस्तों से पोछ लिए

मन बोझलता को प्राप्त किया

तब निज संगत में कूच किए

सब खुद संभाले जाता हूँ

इसलिए ऐसे मुस्काता हूँ


आज ह्रदय पटल जो खोल दिए

आज तुमसे सारे राज़ बोल दिए

कैसे मैं हस्ता जाता हूँ

कैसे ऐसे मुस्काता हूँ


ये बात किसीसे कहना ना


बस अपने तक ही रखना तुम

विश्वास है जो ये दिखलाया

इसकी लाज आज निभाना तुम


कोई भी तुमसे पूछे तो

ये सारी बातें छिपा लेना

ज़ख्मों को ताक  पे रखके

आज ये विश्वास दिखाता हूँ

तुमसे सबकुछ कह जाता हूँ

और फिर युहीं मुस्काता हूँ


कोई पूछे मेरे बारे में

तो हसकर तुम भी मुकर जाना

हसना उसकी प्रवृत्ति है

ऐसा कह बात बदल जाना

क्यों हूँ मुस्काता जानू  मैं

अब तुम भी समझ ये पाती हो

अब देखें कैसे अपने तक

ये सारे राज़ रख पाती हो


तुम्हारे पन्नों पे आज अपना दर्द झलकाता हूँ

कहीं तुम किसीसे कहना मत

तुमसे ये बात कह जाता हूँ

चाहे कोई आये तुम कहना मत


जो बात हुई झुठलाता हूँ

अब वापस हस्ते जाता हूँ

बस मैं जानू और वो जाने...

क्यों इतना मैं मुस्काता हूँ ...


अब फिर दुनिया में घुलने को पानी सम मन बनाता हूँ

लोग कहते चाहे जो रहें

बस मैं जानू क्यों मुस्काता हूँ ...

बस मैं जानू क्यों मुस्काता हूँ ...


By Aditya Jha




Recent Posts

See All
Mirrored Truth

By Rufaida Manzoor I stood beside the silent lake, With eyes that felt no urge to break. My hair fell low in shadows deep, The waters...

 
 
 
My Antidote

By Anveeksha Reddy You fill my books with your ink, seeping into the pages bright and brilliant The words etched into the cracks of it,...

 
 
 
Avarice

By Anveeksha Reddy You tear my skin and pick on my bones I label it as gluttony for you Churning and shattering the remains of my...

 
 
 

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page