मैं आगे बढता गया और सब कुछ पीछे छूटता गया
Updated: Sep 16, 2025
By Vishwajeet Jitendra Ghorade
जिंदगी में रफ्तार पकड़ने की ख्वाहिश
धीरे-धीरे अब मुझे चिंता सताने लगी थी,
चिंता! सब कुछ पीछे छूट जाने की-
दोस्ती, रिश्ते और खुद जिंदगी।
खैर,
समय चलता गया
और एक ‘माया’ से अंजान,
मैं आगे बढ़ता गया
और देखते ही देखते, स्वाभाविक रूप से सब कुछ पीछे छूटता गया।
डर नहीं लगता था अकेला होने में,
शायद ये जान कर की ‘मैं आगे तो बढ़ रहा हूँ।‘
रिश्तों का पीछे छूट जाना यूं मंजूर तो नहीं था पर कम से कम,
‘मैं आगे तो बढ़ रहा था!’
चलते-चलते थक कर, थोड़ी देर बैठ कर, जब मैंने ‘एकांत’ में सोचा तो ये पाया की,
आगे बढने की तमन्ना लिए वो मैं ही था असल में
जो धीरे धीरे...पिछे छूट रहा था...
By Vishwajeet Jitendra Ghorade

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