मैं अलग हूं
By Marianne Salunkhe
मैं अलग हूं!
कविता के बारे में :
इस कविता द्वारा , हम अपने मन में प्रत्येक व्यक्ति की भिन्नता या अलगपन की सूची बना लेते है जिससे वह व्यक्ति नीचा दिखे। इस दौरान उसे ठेस पहुंचाते हैं। हम भूल गए हैं कि हमें बनानेवाले ईश्वर ने सबमें दुख और सुख समान बांटे हैं और हमें किसीका दर्द न बनते , हमदर्द बनना चाहिए।
मैं अलग हूं
मेरा समाज अलग है।
मैं अलग हूं
कुलदीपक की राह तख्ती घर की बेटी हूं।
मैं अलग हूं
मेरा देश अलग है।
मैं अलग हूं
मेरा औदा नही।
मैं अलग हूं
मेरी जात छोटी है।
मैं अलग हूं
मुझमें दाग हैं।
मैं अलग हूं
मेरी सोच आपसे विपरीत है।
मैं अलग हूं
मैं कामयाब नही।
मैं अलग हूं
मेरा छल हुआ है।
मैं अलग हूं
मेरे संतान नहीं।
मैं अलग हूं
मैं विकलांग हूं।
मैं अलग हूं
मेरी ऊंचाई नही।
मैं अलग हूं
मेरा वजन ठीक नही।
मैं अलग हूं
मेरे बाल नहीं।
मैं अलग हूं
मैं हमेशा बीमार रहता हूं।
मैं अलग हूं
मुझमें कुछ खास ही नही।
ईश्वर की संतानों की दुनिया में,
मैं "अलग" ही झुलस रहा हूं।
"अलग" ही मेरा वजूद है,
"आम" में क्यों जागे "अलग" के लिए हमदर्दी?
"अलग" - इंसान का भेद है,
ईश्वर का नही
न मैं उसका कोप हूं,
न मेरे कर्म बुरे,
अपनी अपनी परीक्षा देते हैं सब,
"अलग" को भी मेहर देता है रब।
By Marianne Salunkhe

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