मैं अक्सर अपनी खिड़की पर
By Anjan Sharma
धूप खोजता हूं, उजला, सुनहरा दिन का रूप खोजता हूं। ढूंढता हूं वो पंछी जो बचपन में देखता था,
मुट्ठी में दाने भर उनकी ओर फेंकता था। इठलाती तितलियां अटारी के गमलों पर, ढूंढता हूं मंडराते भौरें गुलाब की कलमों
पर,
मैं अक्सर अपनी खिड़की पर........
दुपहरी ढलते गर्मी चुपके से भीतर आ
जाती थी,
अब परदे हैं, छांव है।
जालियों से ढंकी है अब खिड़कियां,
फिजाओं में बहती माटी को ठांव है। पर एकाकी में घुटन सी होती है, सुकूं नहीं ही वक्त की इस ज़ैद में।
सलाखें है औरों की खातिर मगर, _इस ओर तो मैं भी हूं कैद में।
इस कैद से उड़ना चाहता हूं, हवाओं से जुड़ना चाहता हू।
पर मैं "पर" कहां से लाऊं, सांसों में जान कहां से पाऊं।
बैठता हूं अब भी जमीं की ओर झांकता,
तो कभी आसमां को ताकता,
मैं अक्सर अपनी खिड़की पर......
By Anjan Sharma

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