मेरे पापा
By Vikas Kumar
बचपन में एक अलगाव था आपसे,
कई बार शिकायत की थी मां से||
पापा ने खिलौने नहीं दिलाए, न ही चाकलेट दिलाई|
सारी शैतानियां चली जाती थी, होते ही आपकी मुंह दिखाई||
आज जब थोड़ी अकल आ गई है|
तो आपकी वो सारी मनाही, बड़ी भा गई है||
दुनिया की सारी बुराईयों से बचाकर, दुनियादारी भी सिखाना है|
शायद यह भी एक कारण है, जो एक पिता को कठोर बनाता है||
मेरी जरूरतों को हमेशा, अपनी ख्वाहिशों से उपर रखा|
अरे तू चिंता क्यों करता है मैं हूँ न, हमेशा यही कहा||
न ज्यादा ढील दी,
न ज्यादा कडाई की|
आपने परवरिश के पतंग का balance,
हवा में बराबर बनाई रखी||
कभी-कभी लगता है,
आप बडे़ कलाकार हो|
कल ही तो मेरी एक गलती पे judge बने बैठे थे,
आज मेरी परेशानी पे मेरे सलाहकार हो||
बाहर से सख्त अंदर से नर्म, आप घर की आन हो|
मेरा नाम, मेरा वजूद आपसे, आप ही मेरे भगवान हो||
By Vikas Kumar

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