मेरे दस्तखत
By Nitika Soin
मैं भीड़ में बैठी ख़ामोशी हूँ, मैं रात भर जागती बेहोशी हूँ,
मैं किसी दायरे में पाबन्द नहीं, मैं दरिया सी फरामोशी हूँ।
मैं अदना सा इलज़ाम हूँ, तेरे नाम से जुड़ता नाम हूँ,
मैं आवारगी की कोई कहानी हूँ, मैं इश्क़ की सुल्तानी हूँ।
मैं तेरे मर्ज़ की दवा नहीं, तेरे हक़ में पढ़ी दुआ नहीं,
मैं जवाब नहीं सवाल हूँ, मैं आज़माइशों की मिसाल हूँ।
मैं साज़ नहीं सामान नहीं, मैं रोज़ बदलता अरमान नहीं,
मैं महज़ लफ्ज़ नहीं शायरी हूँ, तेरे दराज़ में राखी पुरानी डायरी हूँ।
मैं क्या बताऊँ मैं क्या हूँ, मैं शहर से लगा बियांबाँ हूँ,
मैं हर सु बिखरा रंग हूँ, मैं खुद से लड़ती हुई जंग हूँ।
मैं ठन्डे पानी की छींट हूँ, मैं शरारती हूँ , मैं ढीट हूँ,
मैं पहला सफ़्हा हूँ किताब-ए-अहद का , मैं पत्थर की लकीट हूँ।
मैं नींद से लड़ता ख्वाब हूँ, अपनी रियासतों का मैं नवाब हूँ,
आँखों में तेरी उमड़ रहा, मैं नमकीन पानी का सैलाब हूँ।
मैं तेज़ हूँ, तर्रार हूँ, अपने फैसलों का ऐतबार हूँ, मुसलसल एक इंकार हूँ,
तेरी कहानी में आ चुका, मैं बड़ा ज़िद्दी किरदार हूँ।
मैं बेहिसाब तारीकी हूँ, मैं सोच की बारीकी हूँ,
मैं जुर्म बड़ा संगीन हूँ, मैं मायूसी में भी यकीन हूँ।
मैं खुद भी हैरानी में हूँ, मैं किस क़दर वीरानी में हूँ,
मैं किसी कमरे में क़ैद नहीं, मैं खुद अपनी निगरानी में हूँ।
मैं खबर नहीं मैं सदमा हूँ, मैं वक़्त से लड़ता लम्हा हूँ,
मैं अश्क़ नहीं आग हूँ, मैं सुनहरे रंग का दाग हूँ।
मैं बारीक रेशम की कढ़ाई हूँ, मैं धुप में बैठी माँ की बुनाई हूँ,
न खुदगर्ज़ हूँ, न बेवफाई हूँ, मैं बस बिना बात की रुसवाई हूँ।
मैं बारिशों का पानी भी, मैं समंदर भी तूफानी हूँ,
तू मेरी गैरत को नाप ले, मैं दुश्मन भी खानदानी हूँ।
कभी यकीनन कभी काश हूँ, कभी पोशीदा कभी फाश हूँ,
हर चेहरे में खुद को ढूंढती, हूँ मैं रोज़ खुदअपनी तलाश हूँ।
By Nitika Soin

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