मेरी वसिय्यत
By Mahendra Dhirajlal Kamdar
नाकाम हसरतोंकी सारी जागीर मेरी, साथ मेरे रुख़्सत होगी,
कल जब उठी होगी अर्थी मेरी, तब यही मेरी वसिय्यत होगी,
कुछ अधूरीसी दास्ताँ हमारी, बंद आँखोंमे तेरी तस्वीर होगी,
कुछ अधूरे ख़्वाब-ए-तहरीर, बस यही मेरी मिलकियत होगी,
कुछ बदनाम आवारगी हमारी, और गुम-नामसी तहरीर होगी,
कतबा-ए-क़सीदा कहाँ नसीब, होगी जब्र-ए-मशिय्यत होगी,
न शोहरत का ताज है नसीब, न धन दौलत की जागीर होगी,
दो गज़ ज़मीन ही होगी नसीब, बस मौतकी यही ने'मत होगी,
न तक़दीर की रहमत है नसीब, न तदबीर से ही बसर होगी,
दोस्तों से ही दुश्मनी है नसीब, और क्या मेरी किस्मत होगी,
चाहो तो कर दूँ नाम तेरे, सदाक़तभी मेरी जो बे-असर होगी,
अश्कोंके मोती झाया न करना, बस यही मेरी नसीहत होगी,
क्या ग़नीमत होगी, गर मय-ख़ानेके क़रीब मेरी मज़ार होगी,
साक़ी की नज़रें करम होगी, और कैसी मेरी ज़ियारत होगी,
चाहे शाने से कट जाए सर मेरा, यही तो मेरी शहादत होगी,
हो गर इंसाँकी मिट्टीके ख़ुदा, तो का'बे से मेरी बग़ावत होगी,
'काफ़िर'के भेसमें मोमिन रहा, फिर क्यों तेरी 'अदावत होगी,
गर मेरे सज्दों की हार होगी, ख़ुदा तेरी भी तो शिकस्त होगी.
By Mahendra Dhirajlal Kamdar

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