मेरी कहानी (औरत)
By Dharam Singh Meena
हूँ मैं बेटी, हूँ मैं माँ, हूँ इस संसार कि जननी मैं, फिर क्यों हर बार, बार बार ये कीमत मुझे चुकानी हैं,
क्यूँ इतनी बेदर्द मेरी ये कहानी हैं क्यूँ इतनी बेदर्द मेरी ये कहानी हैं |
यूँ तो लोग पूजे मुझे पूजे मेरी परछाई को, पर समझ नही पाती हूँ मैं क्यूँ इस दुनिया कि सच्चाई को|
कभी निर्भया कभी श्रददा बनके मैं क्यूँ रह जाती हूँ, बस यही सवाल हैं मेरा मैं क्यूँ ये समझ नहीं पाती हूँ,
क्यूँ इन पेंतीस (35) टुकड़ो में हर बार ही मैं काटी जाती हूँ, क्यूँ में यूँ ही घुट घुट के मर जाती हूँ|
जीने का हक हैं मुझको, मुझको भी तो आगे बढ़ना हैं, आखिर क्यूँ ए मर्द हो गया इतना छोटा तेरा सीना हैं|
औरत बन के क्यूँ हर बार मुझे ही ठोकरे खानी हैं, ए मर्द तुझे ही क्या मुझ पर ही अपनी मर्दानगी दिखानी हैं|
मैं हूँ प्यारी चिडिया मैं भी तो उड़ना चाहती हूँ, पढ़ लिखकर मैं भी तो आगे बढना चाहती हूँ,
फिर क्यूँ हर बार, बार बार ये कीमत मुझे चुकानी हैं, क्यूँ इतनी बेदर्द मेरी ये कहानी हैं, क्यूँ इतनी बेदर्द मेरी ये कहानी हैं|
पल पल हर पल बस ये ही सवाल मैं खुद से पूछती हूँ, क्यों लड़की बनकर हर बार ही मैं अपने को कोसती हूँ|
मैं हूँ दुर्गा मैं हूँ शक्ति, मुझ में ही तो ममता बसती हैं, फिर क्यूँ इस संसार में हो रही मेरी इज्ज़त इतनी सस्ती हैं|
फिर क्यों हर बार, बार बार ये कीमत मुझे चुकानी हैं,
क्यों इनती बेदर्द मेरी ये कहानी हैं क्यों इतनी बेदर्द मेरी ये कहानी हैं
By Dharam Singh Meena

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