मेरी कथा का तुम पानी
By Vishal Raj Amaresh
मेरी कथा का तुम पानी,
मन-देह-शय्या पर बलखाती।
हर रंग बहारों की गलियाँ,
और दूर सितारों की अलियाँ,
पीले से जलते दीप पे हिलते
अमावस में बहती ज्योत की नदियाँ
सब रंगत कि उजली चादर
पहन के बरसा है अब सावन
हर कुम्हलाए से पत्तों ने अब
हनक के झाड़ी है अपनी आँचल
विहंगम कल को आस बिठाए,
मौन बधिर हो स्वर फुसलाए,
और सज्ज हो कोंपल के अंतर,
रुक-रुक कर शबनम भी गिर जाए,
जब रूपों के अनगिन भेदों में,
स्वप्नों के दर्पण टाँग रक्खे थे,
केवल जग के उचट स्वार्थ को,
तेरे बोध-अंक तब पाल रहें थे,
अभिसार पलों में होते थे सारी,
विधियों के रस के प्रहरी भारी,
नयनों के दृश्य दर्शन पिघलाते,
सांँसों में कंँपती थी वाणी!
मेरी कथा का तुम पानी,
मन-देह-शय्या पर बलखाती।
गोपन व्यथाओं के सिरहाने,
बैठे सुनते जब अक्षर सारे,
बांध सभी निर्णित भेद-स्राव,
चुप अधरों से रहते गीत बहाते,
कई बार लगा मैं विश्व भूल
अकिंचन वन में घनघोर घूम,
दुनिया के त्रास में प्लावित घुटता,
किन्तु पग-शूल पड़ी तू वैदेही मूल,
अपूर्व समायोजन है जग का,
अथाह नयन दिखलाता तुझसा,
इस क्लांत ठिठुरते मन रोपण में,
फिर उग-उग जाता आलिंगन तेरा,
उर धाम थाम वे संदेश समूचे,
चंदन सौरभ से जल को सींचे,
उस दिन अटल निर्माण था मेरा,
अगम्य रहस्य जब तट तीर थे उघरे,
कर सबल तरुण-गाथाएँ पुरानी,
जो रह रह कर जीवन में गहराती,
नभ-धरा का उन आँखों पर नर्तन,
भूली जाती नहीं कहानी!
मेरी कथा का तुम पानी,
मन-देह-शय्या पर बलखाती।
By Vishal Raj Amaresh

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