मेरी उलझनें
By Saurav Suman, (Pen Name --Shadow)
अभी तो बिखरे से है ख्वाब मेरे
अभी तो सारी खुशियां बाकी है
रोज गिरता हुँ, सम्भलता हुँ
पर हर रोज ये बात सताती है,
कि जिस रास्ते हू मैं चल पड़ा
उसके लिए क्या ये प्रयास काफ़ी है....
भोर की किरनो से पुछा
पुछा हर उपवन की डाली से ,
कि जिस मंजिल की ओर मैं बढ़ चला हूं
उसके लिए क्या इतना ज़िद्द और जूनून काफ़ी है...
गैरो को तो सुना है मैंने
पर, अब व्यंग्य है
हर अपने की बातों में .....
देख इसी परिवर्तन को हर रोज पुछा करता हूं मैं खुद से
की जिस लक्ष्य को मैं भेदने चला ,
उसके लिए क्या अपनों का परित्याग जरूरी है .....
लेकर अभिलाषाओं की बोरी भटक रहा मैं इधर उधर
क्या यही मेरी मंजिल है या मेरी उड़ान के लिए
और भी आसमान बाकी है......
क्या बिखर चुके हैं सारे ख्वाब मेरे,
क्या अब भी खुशियां बाकी है ?......
देख मेरी उलझनों को समय भी एकदीन बोल पड़ा,
ना हो उदास, तू कर प्रयास
परिश्रम हर ताले की चाभी है,
ये तो बस शुरुआत है तेरी
___ अभी तो अंतिम प्रयास बाकी है ....
अभी तो बचे हैं सारे ख़्वाब तेरे,
अभी तो सारी खुशियां बाकी है
By Saurav Suman, (Pen Name --Shadow)

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