मेरा भारत
By Bhavesh Agarwal
भाव विभोर अंतरमं में,
वो अमिट छवी छोड़ चला
धरती में जन्में उन वीरों,,
की अमर कहानी छोड़ चला//
चाह रहा है देश अपना हमसे
अब तो ऐ भारतवासी जागो
जो हो कहीं ना फर्ज़ अदा
अब लिए साँस में सरफ़रोशी जागो
क्या नहीं था अपना साफ़ चित्मन
कभी ये देश सोने का नहीं था क्या
क्यों अपनों को अलग किया है
वशुधा हमारा कुटुंभ नहीं क्या
रोजाना के होते दंगे देख
तुम सो जाना क्यों चाहते हो
सिंह समान हृदय लिए जन्मा
महाराणा हमारा नहीं था क्या
वो झांसी की अमर अनल लिए
चड़ बैठी जो सिंहासन पे
क्यों तुम अकेली बेचारी हो
वो लक्ष्मी अकेली नहीं थी क्या
जीना था बनके शेर जिनको
वो मरते मरते जिंदा हैं
सवा लाख से एक लड़ाते
तुम्हारे ही वंशज़ नहीं थे क्या
क्यों अब हमसे नहीं होता है
भरस्ट्रचरियो का विपक्ष-विरोध
जो लाठी खा कर मुस्काए थे
वो लाला हममें नहीं हैं क्या
जाग उठो इस धरती के बालक
तुम जीगर में लिए आग जागो
खतम करो अब नादानी मित्रों
अब लिए दिलों में भारत जाओ
चाह रहा है देश अपना हमसें
अब तो ऐ भारतवासी जागो
जो हो कहीं ना फ़र्ज़ अदा
अब लिए साँस में सरफ़रोशी जागो
By Bhavesh Agarwal

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