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मृत्युदंड

Apr 14, 2023
9 min read

Updated: Jun 6, 2023

By Chetan Bhakuni



1

डगर के उस पार यौवन की गलियों मे

रैना बाजार खिलता जोबन की नुमाइश पे

वेश्या के जीवन का विचित्र है यहाँ मोल

अंकित मूल्य भावनाओं का माटी के तोल

इसी माटी से जुडी उस औरत की कहानी

नामी है जो मृत्युदंड की ज़ुबानी

कहते है लोग ये बात है उस रोज़ की

जब शोलाकुल मे दौड़ी खुशी की एक लहर सी


2

गूँज उठे थे नगरी के रस्ते गलियारें

नवजात शिशु की किलकारी पे चिपके चकफेरी बंजारे

हौले-हौले से बढ़ रही थी महानुभवों की मंडली

प्रश्नो पे प्रश्नो की विख्यात तुकबंधी

कौन है इस कुलदीपक का अज्ञात जन्मदाता ?

कैसे कुलटा ने इस हराम को कोख में पाला ?

इस अभागे को ये वेश्या क्या नाम देगी ?

कैसे ये पालेगी ये कस्बी बेचारी ?



3

धीरे-धीरे प्रश्नो ने ली विवाद की अंगड़ाई

विचारों की गुत्थम-गुत्था मच गयी त्राहि-त्राहि

जोश में पकड़ा कल्लू चरसी ने यादव का गिरेबान

चंडूखाने के नशेड़ियों ने उठा लिया सर पर आसमान

देख तमाशा जंगल का मीना जो कपकपाई

भींच मुन्नी को चिलमन मे माथे पर सहलाई

“सुन लो एक वकत वेश्या की दया गुहार”

“न पुकारो इस देवी को वेश्या मेरे साहूकार”


4

अनुसन्धान के जलूस मे छा गया पल भर का सन्नाटा

दंग रहे गए थे पड़ोस के अधनंगे पनवाड़ी चाचा

"यह लड़का नहीं लड़की है" बोला नथू दरजी

लड़खड़ाई ललनवाड़ी वाली बुआ सकपकायी सी

मिट गया हो आसमान से जैसे घन कोहरा

एकाएक उलट गया मायूसियत का ढिंढोरा

सहमा हुआ था फिर भी हकला उठा कल्लू चरसी

“ये सोने की मुर्गी तो है कुम्हलाई सी"


5

टूट गया मीना के सबर का बाँध

भरी बस्ती मे उछला उसकी संतान का सम्मान

क्रोध मे मीना के होठ तिलमिलाए से

शब्दों की ज्वाला से लोग थरथराये थे

“जल जाये जीभ इन जल्लाद दलालों की”

“एक निष्छल प्राण को हरामन कहने वालो की”

“होगी पूर्ण मेरी एक अंतिम अपेक्षा”

“नहीं बनेगी एक वेश्या की बेटी वेश्या”


6

बात मे एक ज़ोर था ठहराव था

पर दर्शकों की सूरत पर अजब ताव था

सीना तान के आ खड़ा हुआ काल्टा बाली

"कैसे दी इस कस्बी ने हमको गाली"

रोक लिया किसी तरह नथु दरजी ने बाली को

माफ़ कर दो एक तलब इस बावली की गलती को

कोना पकडे खिलखिला रहा था हकलू मोची

"ज़रा बेसुध मीना को होश मे लाओ परजाइ जी"


7

हँस रहा था ज़माना एक वेश्या की दुहाई पर

अश्रु के बौछार से ये धरती थी बेखबर

चीर कर भीड़ को एकाएक राजू लाकड़ प्रकट हुआ

उसके स्वेद के रिसाव से कल्लू अकस्मात सन्न हुआ

सुनते हो लाया हूँ बक्की मूर्खों के लिए खबर

रखने वाली है मुन्नी बाई कदम मीना के दालान पर

सुनने के देरी थी हुड़दंग मची भीड़ मे

मूरत बन खड़े हुए आंगन के कोने मे


8

क्षण भर की बात थी आगमन हुआ मुन्नी का

सघन कदमो की आहट पर धमक रहा था पछुआ

सन्नाटे मे टूट गयी आलोचनाओं की बेड़ियाँ

जो देखा मुन्नी बाई ने मीना को लेते सिसकियाँ

दौड़ लपक के जकड़ी मीना के अमूल्य आँसुओं को

"ऐ मेरी सखी! बता क्या गम है तुझको ?"

फूट-फूट कर रोती मीना टूटे शब्दों मे बड़बड़ाई

“कहती ये दुनिआ मेरी दुलारी को वेश्या मुन्नी बाई”


9

तना हुआ माहौल था कुछ गंभीर सा संगीन सा

प्रविष्ट हुआ भीम सिंह हवलदार जो मगरूर था

चाल मे एक रौब था मूछे थी तनी हुई

खौफ की लहर से मीना मुन्नी पे लिपट गयी

ऐंठ थी ज़ुबान पर कुछ इस तरह बोल पड़ा

“हुकुम के द्वार पेशी तेरी अब और तू न कराह”

ज़ुबान की तान कहीं हलक मे अटक गयी

मंजुल सपनो की छवि पल भर मे सिमट गयी


10

वर्दी का ज़ोर था टशन था हवलदार का

झन्ना गयी मुन्नी तो सबर का इम्तिहान था

आँखों मे तेज़ था पलट जो वार किया

हवलदार भीम सिंह उसी पल ठहर गया

“एक शब्द न बोल तू खींच लूंगी ये ज़ुबान”

“दरोगा की आड़ मे न मरोड़ मेरे कान”

“घूर न मुझे तू दबे पाँव निकल जा”

“बोल दे दरोगा से मीना को भूल जा”


11

संगीन सा माहौल था अब और संगीन हो गया

मर्दानगी का अदब था अपना रुतबा खो गया

ढीट था हवलदार भी घुड़की देता चल पड़ा

“एक कस्बी की आग मे जलेगी हज़ारों की चिता”

सवाल जो हज़ार थे चित्त से उतर गए

खुद को बागी कहने वाले भीगी बिल्ली बन गए

ये दहशत की आग का महज सबब था

मीना के आँगन पे अब सन्नाटे का कहर था


12

बात की भनक जो लग गयी दरोगा को

भयभीत था भीम सिंह अंत था नज़दीक तो

भड़की थी चिंगारी सी अब आग बन गयी

तमंचे की नली भीम सिंह की ओर मुड़ गयी

दाब था आवाज़ मे की सूरमा ढल जाये

“बोल भीम सिंह तेरे साथ क्या सलूख किया जाये?”

बिदक गया भीम सिंह देख मौत का मंज़र

“दया करो प्रभु न फेरो मौत का खंजर”


13

मजबूर था अशक्त सा घुटनो पे गिर पड़ा

विरजमान सुल्तान था हुआ उठ खड़ा

“सदियों की आन थी माटी मे मिल गयी”

“पैर की धूल चाटने वलियाँ गिरेबान तक आ गयी”

“दिन दहाड़े ये कसबिया ढोल बजाए“

“लगता है चींटीओं के भी पर निकल आये”

बात के ज़ोर पे गोली चली धांये से

सन गयी थी माटी खून के जवार से


14

पिटना तो ढिंढोरा था हवलदार की मौत का

पहुँच गया राजू लकड़ जो नगरी का मुखबिर था

मुंनि बाई! मुन्नी बाई! प्रलय आ गया

ठुल्ला भीम सिंह दिन दहाड़े गुज़र गया

सुनने मे आया है टुकड़े किये उसके हज़ार

दरोगा के सर पर अब है खून सवार

कहता हूँ मै "मरने दो इस कस्बी को"

भगवन से डरो और माफ़ी मांग लो


15

बड़बड़ाता अस्पष्ट सा कायर सा भग पड़ा

सैलाब था बज्जर मे आतंक हुल्लड़ खड़ा

दबे पाँव ज़ोर से खटिआ तक पहुँच कर

देखा मीना उलझी पड़ी थी बच्ची से लिपटकर

समय की डंडी भी दो पल को रुक गयी

अथक इस समय से मुन्नी सहम गयी

सांसो के शोर से चीरते सन्नाटे को

अब होना था वो होनी को मंजूर जो


16

एकाएक तड़क के झटक मीना उठ पड़ी

भयंकर सपना था समक्ष मुन्नी थी खड़ी

धीमे से बोली माथे पर चूमकर

“इन गीदड़ो की फ़ौज से अब और न तू डर”

“आंसुओं को पोछ ले और बात मेरी मान तू”

“दरोगा क्या चीज़ है मै तूफ़ान को रोक दूँ”

बस पिछले दरवाज़े का रास्ता जो पकड़ेगी

कसम तुझे मुन्नी की मुड कर न देखेगी


17

आँखों से आँसू जो होठो पे रुके थे

अक्षरों की आहुति पे शब्द स्तम्भ से खड़े थे

परीक्षा की घडी है अब हम न डरेंगे

आने दे दरोगा को छाती तान के लड़ेंगे

डर न पगली ये तो ज़िन्दगी की एक लहर है

जो ये थमेगी तो खुशियों की पहल है

मान मेरी बात पोंछ दे ये आंसू

संघर्ष के दालान पर औरत का भारी है तराज़ू





18

विचलित जो मन था बेताब था कुछ सहमा सा

जानवरो की दुनिआ मे जस्बातो का क्या मोल था

बच्ची को समेट कर मीना तुरंत भग पड़ी

कदम कदम मीना की नज़र मुन्नी की ओर मुड़ी

इतने मे पहुंची मुन्नी दरवाज़े की चोख तक

खड़ा था दरोगा मीना की दालान पर

ठुल्लों की पलटन थी जोश मे अंगार मे

हाथ मे तमंचा लिए निकले थे शिकार पे


19

मुन्नी बाई मुन्नी बाई अर्सो बाद दिखी मुझे

सलाम ले दरोगा का कैसी है बता मुझे

अब तलक तो ठीक थी पर बोल दे इन ठुलो से

शोर न करे यहाँ मीना को सोने दे

ज़रा दो पल थम जा ओर पी ये चाय कड़क

माफ़ कर मुझे अब ऐसे न भड़क

ये अमानत मेरी तेरे पास जो रखी

अगर मिल जाए मुझे मे निकल पडू अभी


20

ये वेश्या का बाजार है जहाँ मोल बस जिस्म का

कौन है अमानत तेरी? ये मुझे बता ज़रा

बात के चातुर्य से भन्ना गया दरोगा जो

गिर पड़ा मेज़ पर जैसे बात से आघात हो

संतान मेरी कुल है वंश मेरा

एक वेश्या की कोख मे खिला है बीज मेरा

ठाकुरो की जाती मे परवरिश जिस दरोगा की

बाढ़ मे आधार नहीं गरल जो कली


21

ये बच्ची तो प्राण है अस्तित्वा है मीणा का

इन चुटकन से सपनो पे तू नज़र ना लगा

मासूम ये बच्ची है फूल की कली सी

जो खिल जाए अभी तो महक उठे ज़मी

एक माँ की ममता को छीन ना दरोगा तू

देवी का रूप समाज भूल जा इसे तू

ये वादा है मुन्नी का अइसन ना भूलेगी

अपनी कागज़ की कश्ती मे इन्हे जाने दे अभी


22

सपनो का मोल देख वेश्या के बाजार मे

हंस पड़ा दरोगा मुन्नी की गुहार पे

कस्बियों का गाऊँ ये दाम जहान जिस्म का

जोबन की चीर पे सहजे ना विद्या

लाज की आड़ है और नंग यहाँ नाच है

औरत की जात पे वेश्या एक दाग है

अद्भुत है ये पर सपनो का रेला

दो टके की कस्बी और माया मिथ्या का मेला


23

हालत की मारी थी मुन्नी लाचार जो

दरोगा के शब्द जैसे पत्थर का वार हो

कलम की सियाही तो कालिख है औरत पर

कागज़ पर चल जाए तो जल जाए अक्षर

किताबो का बस्ता ना दे एक वकत की रोटी

काम से काम चाटती है अभी मेरी फैंकी हुई बोटी

भूल जा इन सपनो को सच्चाई का अनुभव कर

मरद के पठ पर ही है कैबियों का स्वर्ग


24

खुल गया दरवाज़ा बातो ही बातो मे

एक ठुल्ला चिल्लाया सरकार मीना तो फरार है

मुन्नी की चाल थी फासने की हमको

कहता हूँ मैं धर दबोचते है उसको

रुक जा वही खड़ा है जहाँ तू

मंत्री ना बन मुन्नी से सवालात तो कर लू

सत्य की मूरत मुन्नी ये तो सुना था

पर बचेगी ईमान ये ना सोचा था


25

अरे जा दरोगा जा सत्य का न पाठ पढ़

धर्म ज्ञान के बोल साझे ना तुझ पर

साक्षी है अग्नि सती सा अभिमान है

बेचती हूँ जिस्म पर नापाक ईमान है

होगा तू ठाकुर पर पैदाइश है उस औरत की

जो कस्बी बन जन्मी और तेरी माँ भी

अरे तू क्या समझेगा सरस्वती के उस रूप को

जो समेट बैठी है अखंड ब्रह्माण्ड को



26

ये सत्य का पैगाम है अडिग जो प्रचंड सा

लगा दे तू ज़ोर अपनी गीदड़ो की फ़ौज का

छिछड़े है खवाब मे और खाल है शेर की

कस्बियों पे थूक दे ठाकुरो का बस नहीं

औरत की जात पर हम अगर दाग है

तो ये बता ज़रा दरोगा तू कहाँ का संत है

होनी को जो मंजूर था अब तो वो हो गया

मीणा को भूल जा इसमें है सबका भला


27

क्रूर सी हसी थी बोल उठा दरोगा जो

झाड़ से छाद तक फूंक दो इस झुग्गी को

बांध दो मुन्नी को आलिन्द की चौक पर

देखता हूँ फिर कैसे उठता है कस्बियो का सर

कहने की बस देरी थी लाठी पड़ी मुन्नी पे

धाम से गिर पड़ी दरोगा के जूते पे

तानकर मुछू को खुसफुसाया दरोगा कुछ

पलने वाले टुकड़ो पर समझने चली नित्य सत्य




28

भगति सरपट सी देखी पलट कर मीणा जो

पेड़ो को चीरता उठ रहा था धुआं आसमान को

दो पल थमी तो याद आयी मुन्नी की बात

ना रुकिओ मीणा चाहे कुछ भी हो जाए हालात

कश्मकश की उलझन मे पड़े चंद सिसकियों के शोर

फिर पोछ स्वेद माथे से भागी वो जंगल की और

कुछ ही कदम तो चलती थी देखी फिर वो बादल के छोर

कसकर अपना पल्लू भागी अब वो बस्ती की ओर


29

रोती बिलखती पहुंची मीना बस्ती की गलियों मे

खड़ी थी ललनडवाडी वाली बुआ चौखट की टैक पे

रख लो बुआ मेरी बची को अपने पास

मुन्नी बाई लगा के बैठी है मेरी आस

इतरा के बोली बुआ डंके की चोट पे

शापित ये बच्ची दूर कर इसे नजरो से

जा देख दरोगा ने मुन्नी का क्या हाल किया

विचलित है बस्ती ये मीना तूने क्या किया


30

रूह जिस्म से खींची ऐसी लगी बुआ की बात

उधर ही पसरा था कल्लू चरसी लगा के अपनी खाट

बोला भाग जा मीणा भूल जा मुन्नी को

घात लगा बैठ दरोगा मे सच बोलता हूँ

न होश था ना चैन था विचलित मीणा का मन

पर तेज था आँखों मे अब होगी मैदाने जंग

दस्तक दी हर दरवाज़े पर सोच अपनी बची का हल

कोई खोल दे दरवाज़ा भला ऐसी थी किसकी मजाल


31

घबराई हुई हाफति सी पहुंची घर के आंगन के पास

उठ रहा था धुआं ठप गयी मीना की सांस

मेला था ठुल्लों का घर के चारो और

हस रहा था दरोगा देख लपटों का शोर

चुप्पी से दबे पाँव छिपी कुऍं की मेड पे

गौर से देखा जल रही थी मुन्नी मीना की दालान पे

घनघोर इस द्रिश्य ने पलट डाला अस्तित्व का प्याला

स्तंभित पड़ गयी मीना देख प्रतिशोध की ज्वाला







32

चुटकी भर लम्हो मे आया मीना को होश

देखा चारो तरफ थे ठुल्ले उबल रहा था जोश

भीड़ को चीरता दरोगा प्रकट हुआ

बस कर मीना अब न खेल ज़िन्दिगिओं का जुआ

इस बच्ची का अंत ही भला है

ये एक ठाकुर की पैदाइश है बस यही इसकी सज़ा है

आखरी दफा करता हूँ मे तुझसे विनती

नहीं तो राख मे ढेर हो जाएगी कस्बियों की ये बस्ती


33

बढ़ रहे थे ठुल्ले धीमे से पाँव को दाब कर

उठा के रोड़ा चढ़ गयी मीना कुऍं की मेढ़ पर

आदमजाद का अभिमान ये मिट्टी मे मिल जाएगा

वक़्त का चक्का जो घूमेगा फिर न लौट के आएगा

डंडे के ज़ोर पर कब तक आदम ठाकुर कहलाएगा

इस देवी के मृत्युदंड से ब्रहम भी न बच पाएगा

जिस पल बैठे थे दबोचने दरोगा के पिल्लै घात पे

उसी पल मीना ने झोंक दिआ बच्ची को कुऍं की पगार से


34 देख ये नज़ारा हंगामा जो था थम गया

प्रमाड ये सत्य का मूर्छित ज़माना पड़ गया

फैक मारा रोड़ा मीना ने दरोगा को

आक्रोश था प्रतिशोध का मानो स्वयं ही ज्वाला हो

दो कदम पीछे लिए ठुल्लों की पलटन ने

मुन्नी बाई जप्ती मीना कूदी आँगन की लपटों मे

भूले न भूलती ये बस्ती इस कहानी को

आज भी सुनती ये गालिया मीना की गुहार को


35

ये रीत है मृत्यु की पर जीवन तो अभिमान है

मनुष्य की जाती खुद पे ही अभिशाप है

कहने को तो कर्म ही उच्तम सदाचार है

पर जानवरो की बस्ती मे ये एक नैतिकता का पाठ है

व्यापर है जहाँ जिस्म का पर उमंगो का न मोल है

ऐसी दुनिआ मे तो पत्थर भी एक इंसान है

अब भूल न जाना तुम उस माँ की कहानी

नामी है जो मृत्युदंड की जुबानी


By Chetan Bhakuni
































































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