मृगनयनी तुम मृगतृष्णा हो
By Rahul Chandra
मृगनयनी तुम मृगतृष्णा हो
मीरा हूँ मेरी कृष्णा हो
प्यासा हूँ मेरी प्यास हो तुम
जीवन के मेरी आस हो तुम
मैं देवदास तुम चंद्रमुखी
माया हो फिर भी पास हो तुम
है पता मुझे ये खेल बुरा
फिर भी है प्यारा मेल बहुत
है प्यास अधूरी मिलने की
रहा हृदय मेरा ये झेल बहुत
जल जाऊँगा इस लौ से पर
फिर भी इससे टकराता हूँ
हूँ परवाने सा दीवाना
खुद ही जलने आ जाता हूँ
क्या पता कभी धोखे से ही
ऐसा भी धोखा हो जाये
तुम आओ मुझे चिढ़ाने बस
और दर्शन पूरा हो जाये
जी रहा हूँ इस भूल में जो
तो भूल ही अच्छी है मेरी
जो मिलोगी केवल सपनों में
तो नींद ही अच्छी है मेरी
कब चाहा मैंने जी जाऊं
विषपान बड़ा है प्रिय मुझे
तुम विष हो तो मैं नीलकंठ
श्रृंगार तुम्हारा प्रिय मुझे
जो बिलजी बन के गिर जाओ
हर वार तुम्हारा प्रिय मुझे
तुम शत्रु बनके ही मिल जाओ
तो संसार है सारा प्रिय मुझे
ये जीवन किसने है देखा
है कौन यहाँ जो पूरा है
इनसे मैं क्या कुछ कम हूँ
क्या जीवन मेरा अधूरा है
तुम सच है मेरा सपना हो
हो कुछ भी मेरा अपना हो
जब पास हो तुम मेरे हर क्षण
तो कण कण मेरा अर्पित है
तेरे होने की मृगतृष्णा को
ये जीवन मेरा समर्पित है।
By Rahul Chandra

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