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मुस्कुराहटें कहीं खो सी गई हैं।

Mar 11, 2023
1 min read

By Kunal Verma



जो इन बातों से हताश और परेशान हैं,

कौन है बड़ा धर्म, हिंदुत्व या इस्लाम हैं?

वह यह बतलाए,


कहां जाएंगे लोग मन में फ़िज़ूल इतना मलाल लिए,

अस्तित्व की खोज में, इतिहास के पन्ने पलटते

सियाही लाल हो सी गई हैं,

मुस्कुराहटें कहीं खो सी गई हैं …


भक्ति का यह नया पैमाना है,

की आज इंसानियत को ही मिटाना हैं।

मर जाएंगे लोग ये मिसाल दिए,

कहां जाएंगे लोग मन में इतना मलाल लिए?





राम रहीम के अफसानों में, किस सबब के ये दीवाने हैं?

भूल गए हैं इन गाथाओं का वजूद,

जिस में उदारता के रंग सुहाने हैं,

सत्य की श्वेतता और करुणा की महत्ता,

इन दीवानों ने मलिनता इनपर पोत सी दी हैं,

ग्रंथ की सहजता में नफ़रत कि बीज का,

रोपण इन से हो सी गयी हैं

मुस्कुराहटें कहीं खो सी गई हैं।


छोड़ कर फ़िज़ूल मलाल ये, क्यों ना आगे बढ़ पाते हो?

शांति, अमन और लोकप्रियता की बातें,

इन ग्रंथों में क्यों ना ढूंढ़ पाते हों?

अस्तित्व की खोज में, इतिहास के पन्ने मत पलटों।

वह तुमसे धुंधले हो से गए हैं,

मुस्कुराहटें कहीं खोई नहीं,

उसी धुंध की लाली में,

कत्लेआम और गाली में,

सांसे उनकी घुट सी गयी हैं

मुस्कुराहटें टूट सी गई हैं।


By Kunal Verma





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