मुसाफिरी
By Inder Raheja
तारो की गिनती मे अक्सर मुझसे भूल हो जाती है,
क्या हुआ कभी परछाई मेरी मुझसे गुम हो जाती है,
उलझे हुए मेरे बालो में ये धूप भी इलझ जाती है,
मेरे मैले कपड़ो से अगर थोड़ी बदबू आती है,
जूते के कभी फीते कसते पूरी शाम ढल जाती है,
कभी कोई मख्खी ही अकेली मुझपे भारी पड़ जाती है,
काली परात पे अंडा देख भूख मुझे लग जाती है,
टूटे हुए खिलोने में नई दुनिया सी मिल जाती है,
अपने कदमो की आहट से बेचैनी मेरी बढ़ जाती है,
बिखरे हुए पत्तो की चादर शोर बहुत मचाती है,
प्यार जताते देख किसीको बेसब्री सी छा जाती है,
मेरे तो ख्वाबो में भी कोई परी नही आती है,
तरसती हुई आंखे मेरी कब लालची लग जाती है,
सबसे बड़ी ख्वाइश भी मेरी एक लड्डू पे रुक जाती है,
बड़बड़ाते होंठो को आदत सी पड़ जाती है,
मेरी हर मुस्कान मेरे पागलपन से जुड़ जाती है,
लंबे समय से पड़ी लकीरे झरीटे बन गढ़ जाती है,
बारीश वाले दर्पण में वो शक्ल याद नही आती है,
रोज़ मेरी मेहनत में जाने क्या कमी पड़ जाती है,
जो रात की बची रोटी भी सुबह कुत्ते को मिल जाती है,
सरफ़रोशी की तम्मना तब मेरे मन मे भी जग जाती है,
पर पागल पागल सुनकर मुझको वो गली छोड़नी पड़ी जाती है।
By Inder Raheja

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