मुसाफिर
By Urvashi
ना जाने किस राह पर जाना है,
किस राह पर मंज़िल है,
किस राह ठिकाना है।
मंजिल भी धुंधली है,
रास्ता भी अंजना है।
चले तो हैं पर कोई फांसला तह नहीं,
कब तक चलना है ,
और कहां थम जाना है।
मुसाफिर तो बन चुके ,
बस मानचित्र खुद बनाना है ।
अंततः ये जिंदगी है ,
यहां न कोई मंजिल,
है ना कोई ठिकाना है,
बस चले हैं और चलते ही जाना है।
By Urvashi

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