मुसाफ़िर
By Himanshu Bhatia
इस क़दर तड़पा है तू,
एक चाह मैं।
मिलता नहीं मिल ही गया,
इस कश्मकश को तू छोड़ दे।
गर ये नहीं तो कुछ और ही,
इस बात को तू याद रख।
मुसाफ़िर है तो, मंज़िलो पर ठहरने का समा नहीं,
जी ले अब, इस पल में तू, कल और मंज़िल आएंगी।
जिया नहीं इस पल में तू, तो कल भी क्या कर पाएगा,
अभी है यहीं, यहीं कर सब।
ऐ मुसाफ़िर अब तो तू निकल।
ऐ मुसाफ़िर अब तो तू निकल।।
By Himanshu Bhatia

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