मुमकिन है की
By Anil Kumar
मुमकिन हैं कि
ऊपर पहाड़ो से रिसता झरता पानी
नीचे मैदानों में आते आते अन्ततः
बिला जाये
मुमकिन है कि
पेड़ से गिरता कोई पत्ता
धरती पर गिरने की बजाये
किसी नन्हें बच्चे की हथेली में
समा जाये
मुमकिन है कि
सफर मैं निकलते समय
हम अपना झोला घर पर
भूल आये
मुमकिन है कि
शब्दों के अर्थों को जब नए सिरे से
पूछा जाये
उनके अर्थ बदल दिये जायें
पेड़ को पेड़ न कह जाये
चिड़िया को चिड़िया
और चांद को चांद
यह भी मुमकिन है कि
नींद में चलते चलते कोई बच्चा आये
और हमारे सभी लिखे को
झार पोंछ मिटा कर चला जाये।
By Anil Kumar

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