मुझसे मिलता मैं
By Tushar Joshi
इतने सालों अलग और अकेला रहने के बाद
सालों कभी रोने और ढेर सारे हंसने के बाद II
जब सायो ने घेरा मुझे
भीड़ की तरफ बढ़ते
और खुद से हटते
कभी फिसल कर
कहीं ना थम कर
जब सांस फूलने लगी
दौड़ते हुए मोड़ों पर
बस यूं ही सड़क के कोनों पर
धूल में पड़ी पानी की बूंद की तरह
बरसात से अलग
किसी रूमानी की तरह II
तुझसे मिला मैं II
अब क्या बताता तुझे,
तुझे कितना पिया हूं मैं
लोग तो सिर्फ सोचते हैं,
तुझे तो जी भर जिया हूं मैं
उसे, तुझे और मुझे के अंतर को समेटता
सपनों को कतरन - कतरन सिया हूं मैं II
फिर याद आया कि कहीं और पहुंचना है मुझे I
बरसात में भीगने से पहले कहीं तो घुलना है मुझे II
और ढलने लगा मैं,
शाम से पहले वाले दिन की तरह I
बदलने लगा मौसम,
हवाओं की धड़कन की तरह II
और फिर सिमटने लगा मैं
बिखरते हुए रेत सा I
बरसते हुए फिर भी शेष सा II
अकूट, अदम कोई श्वास भरता हुआ
कहीं किसी और खुद को घसीटता हुआ
मैंने हुंकार भर कर आग लगाना सीख लिया
मैंने चिंगारी को ढक कर आग लगाना सीख लिया II
इसी सीख की किताब के पन्नों के बीच
कहीं रखी हुई दरारों के हल्फो के बीच II
फिर से तुम्हें छोड़ गया
भूल गया
जानबूझकर पानी की बूंद सा
रख गया थोड़ी सी धूल जमने तक.....
और फिर बहुत सी खाली सांसो
उगते हुए दिन और
ढलती - जगती
रातों के बाद.....
शून्य सा तुम्हें अपने साथ लिए
इस बार मुड़ा नहीं
बस खड़ा हूं मैं
धूल की परत से
मोती सी बूंद
पानी की लेने
तुझसे मिलने मैं फिर
उसे, तुझे, मुझे के अंतर को समेटता
आज फिर
मुझसे मिला हूं मैं.....
By Tushar Joshi

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