मुझमे तू हर जगह है
By Raj
मुझमें मैं जरा सा हूँ,
मुझमे तू हर जगह है ।
मैं जीत के भी हार जाता हूँ,
तेरी हार में भी तू फ़तेह है।
और क्या बोलूं मैं
निशब्द सी ये जिरह है।
नीलाम होता बाज़ार हूँ,
इस बात की तू गवाह है।
चौखाने का खेल सा हूँ,
हर चाल में तेरी शह है ।
मरते मरते भी मैं जिन्दा हूँ,
एक तू ही तो वो वजह है।
बारहां खालीपन सा होता है,
दिवाने का ही तो ये शहर है।
बड़ी दूरियाँ है दरमियाँ ये कैसी,
मखौल वाली ये सुलह है ।
ख़ामोशी भी शोर सी है,
मेरी बात कुछ और ही है,
चुप रह के भी बात कर लेता हूँ,
अनोखी अपनी कलह है ।
By Raj

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