मुखौटे
By Kanika Verma
गहरा है ताल्लुक मुखौटों से,
गहरा है वास्ता उन खटकते चहरों से,
बस तुच्छ है वास्ता तो अपने वास्तविक चहरो सेI
अनजान नहीं कोई मुखौटों से,
हर एक काफिर है हर एक दूसरे से,
बस अपरिचित हैं तो,
अपनी ही आत्मा से,
और काफिर ही तो है अपने आप से I
ज्ञानी तो वह वर्षा की बूंदे भी हैं-
मुखौटा पहने,
भू को जल से परीचित कराती हुई उसको प्यास बुझाती रही,
पर वास्तव में-
वसुंधरा से मिलन के लिए बेताब,
वह बूंदे- बूंदे नहीं आँखों की नमी ब्यान करती रही I
नकाब पहने आइना भी तो है,
कहकर- निहारता है जो,
दिखाता है प्रतिबिंब जो,
पर आँखें झुकाये,
मन में छुपाए,
देखता है पुरे जग को वो,
देखता नहीं सिर्फ वह तुम्हें,
पर देखता है तुम्हारे माध्यम से वो I
जुगलबंदी के समय,
वो मुखौटे कैसे आए,
कि चहरों पर बिसमा,
और मन में शिकवा लाए,
कि हवा में मोहब्बत,
और दिलों में जहर घोल आए।
जीवन की पगडण्डी के साथ चलते है,
जीवन की दास्तान ब्यान करते हैं,
आँखों की नमी को छुपाते हैं,
दिल के दर्द को झुठलाते है,
मुखौटे ही जीवन का सामना कराते है,
बस अपने असली मुख से अवज्ञात रह जाते है,
मदद करते है - जीवन को समझने में,
बस चूकते नहीं- खुद से ही मुह फेर जाने में।
By Kanika Verma

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