मुक्ती
By Pranjali Tiwari
मेरे नयनों के अश्रू द्वार पर
मुस्कानों का पहरा था,
छेड़ दिया तुमने जो आकर
घाव वो काफी गहरा था।
गहरा समझा जिस नदिया को
उसका जल तो छिछला था,
समतल भूमी जिसको समझा
पाँव वहीं पर फिसला था।
नाव पुरानी घाट लगी जो
नाविक वहाँ शयाना था,
लहरें जिसको संग ले डूबीं
नौका नई,मांझी अजाना था।
नेह के आगे शीश नवाए
ऐसा मीत पुराना था
मोह को जाके गले लगाया
अँह से मन जो मिलाना था।
भ्रम को फंदा छूटा ज्यों ज्यों
पी को व्यक्त आभार किया,
जलता छोड़ दिया था तुमने
उस दीपक को बुझा दिया।
By Pranjali Tiwari

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