मिलकर हम तुम दीप जलाएं
By Yogesh Kumar Pradhan
घटा घटी, अब क्या जय उसकी,
कौन सुने परिताप की सिसकी
जब बढ़े चमक निज अंतर्मन की
बढ़े रौनकता तब जीवन की,
रौशन हों फिर आठ दिशाएं,
मिलकर हम तुम दीप जलाएं।
चढ़ी रात,तम घन छाया है
व्योम पे निशी की माया है
चलो आज ज्योति दे जग को
उज्ज्वल कर दे धुलित पग को
तिमिर अंत का शोक मनाएं,
मिलकर हम तुम दीप जलाएं।
By Yogesh Kumar Pradhan

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